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Sunday, December 29, 2013

मोनालिसा की सी मुस्कान ( लघु कथा )

" रमणी , तू क्या खाती है ! कितनी स्लिम ट्रिम है ! तेरा डाईट चार्ट लाना , मैं भी वही खाऊँगी कल से !" आमला चकित सी और थोड़ी ईर्ष्यालु सी हुई जा रही थी रमणी से कहते हुए।
रमणी जो कि जिम कि परिचारिका थी। भूख और हालात कि मारी हुई। जैसे- तैसे परिवार और छोटे बच्चे का पेट पाल रही थी।
भारी भरकम आमला का भार कई महीने से जिम आते हुए भी कम नहीं हो रहा था। ऐसे में शायद अनजाने में ही रमणी की डाइट- चार्ट पूछ बैठी।
अब रमणी क्या बताती कि वह सिर्फ गम खाती है। अच्छा खाना कब खाया था ,याद ही नहीं। लेकिन प्रकट में वह मुस्कुरा रही थी अपने होठों पर मोनालिसा की सी मुस्कान लिए।

Sunday, December 15, 2013

एक पल

        सुधा जब से किट्टी पार्टी से लौटी है तभी से चुप है। जैसे कुछ सोच रही है। हाँ , सोच तो रही है वह। आज जो बातें किट्टी में हुई। वे बातें उसे थोडा आंदोलित कर रही है। कभी -कभी वह खुद अपने आप पर ही झुंझला जाती है कि वह दूसरी औरतों की  तरह बेबाक क्यूँ नहीं है। क्यूँ नहीं वह उनकी बचकानी बातों का समर्थन कर खिलखिला कर हंसती। आज तो बहुत गम्भीर विषय था तो भी बातों का स्तर कितना हल्का था।
         बात दामिनी को ले कर चली थी। दामिनी के साथ जो हादसा हुआ और किस तरह सभी के मनों को झिंझोड़  गया था। जितना शोर मचा था, वह सिर्फ मिडिया में ही था। बहुत कम लोग थे जिन्होंने दामिनी से सहानुभूति दिखाई हो। क्या उसके बाद ऐसे हादसे नहीं  हुए !
      सारिका के यह कहने पर कि बॉय फ्रेंड के साथ कु -समय जायेगी तो यही होगा ! सुधा से रहा नहीं गया और बोल पड़ी कि यह भी क्या बात हुई अगर वह उस समय अपने किसी  परिजन के साथ होती तो या अगर घर में कोई बीमार हो जाता और उसे अचानक अकेली ही घर से निकलना पड़ता तो ! क्या जो कुछ उसके साथ हुआ वह जायज था। हम सभ्य समाज में रहते हैं। किसी जंगल में तो नहीं कि भेड़िया आएगा और खा जायेगा ! क्या उन लोगों के अपने परिवार की कोई लड़की होती तो क्या वे सब यह करते ? इस पर भी कई मतभेद उभरे। लेकिन सभी का एक मत कि देर रात ऐसे घर से निकलना नासमझी ही है। जब तक  हालत सुधरते नहीं। खुद की  सावधानी भी जरुरी होती है।
        खुद सावधान रहना चाहिए। इस बात को तो सुधा भी मानती है। वह बचपन में ही माँ से सुनती हुई आयी थी कि अपनी सावधानी से हमेशा बचाव रहता है। माँ रात को सोने से पहले घर के सारे कुंडे -चिटकनिया और परदे के पीछे हमेशा झाँक कर देखती और सावधानी का वाक्य दोहरा देती थी। जब वह होस्टल गयी तो भी माँ ने यही वाक्य दोहराया और यह भी सलाह दे डाली कि किसी से भी ज्यादा दोस्ती ना करो ना ही बैर रखो। माँ की यह सलाह उसके गाँठ बांध ली और अभी भी तक अमल करती है इस बात पर। तभी तो वह सभी से  एक सामान व्यवहार कर पाती है।
        सुधा सोच रही थी कि हादसे तो कभी भी हो सकते हैं। रात का होना कोई जरुरी तो नहीं। यह तो बुरा वक्त होता है जो किसी का आना नहीं चाहिए। वक्त अगर दामिनी का खराब था तो वक्त उन दरिंदो का भी अच्छा नहीं था। तभी तो उनसे यह वारदात हुई। बुरे वक्त और अच्छे वक्त के बीच एक पल ही होता है जो इंसान पर हावी हो जाता है।
  ऐसा ही एक पल सुधा की जिंदगी में आया भी था। अगर वह स्वविवेक से काम न लेती तो...! इससे आगे वह सोच नहीं पाती और सिहर जाती है। हालंकि इस घटना को 26 वर्ष से भी अधिक हो चुका था।
     26 साल पहले जब वह होस्टल में थी तब उसके ताऊ जी भी वहीँ शहर में ही रहते थे।  दो-चार दिन के अवकाश में अक्सर  उनके घर चली जाया करती थी। एक बार तीन   छुट्टियाँ एक साथ पड़ रही थी तो उसने ताउजी के घर जाने की सोची। वार्डन से  छुट्टी की  आज्ञा ले कर हॉस्टल से बाहर आ गई। रिक्शा की तलाश करने लगी। उसको भीड़ से परेशानी और घुटन होती है तो वह सिटी बस से परहेज़ ही करती थी। एक रिक्शा मिला और 7 रुपयों में तय करके बैठ गई।  कुछ दूर जाने पर  उसे लगा कि  रिक्शा वाला गलत रास्ते पर जा रहा है । उसे रास्ता मालूम था। उसने रिक्शे वाले को टोका भी कि वह गलत जा रहा है।  वह बोला कि ये शॉर्ट -कट है।
         सुधा ने सोचा हो सकता है कि इसे ज्यादा मालूम है। लेकिन उसे फिर भी शक हुआ जा रहा था कि वह गलत जा रहा है। कई देर चलने के बाद वह एक पैट्रोल -पम्प के पास जा कर रुका और बोला कि शायद वह रास्ता भूल गया और पूछ कर आ रहा है। सुधा चुप कर बैठी रही। तभी कुछ आवाज़ें सुनायी दी तो उसने गरदन घुमाई। सामने यानि पैट्रोल -पम्प के पीछे की तरफ एक कमरे के आगे से दो आदमी उसको अपनी तरफ बुला रहे है। वह रिक्शे से उतरने को हुई। अचानक  फिर दिमाग में एक विचार कोंध गया कि वह क्यूँ उतर रही है !कलेजा उछल कर गले में आ गया। लेकिन कस कर रिक्शा पकड़ लिया और गरदन घुमा  कर बैठ गई।
      थोड़ी ही देर में रिक्शा वाला आकर बोला कि वह खुद जा कर रास्ता पूछ ले। सुधा का हालाँकि कलेज़ा कांप रहा था फिर भी जबड़े भींच कर लगभग डांटते हुए बोली कि रास्ता उसे पता है। वह उसे ले जायेगी। रिक्शे वाला उसके तेवर देख कर सहम गया और रिक्शे पर बैठ कर बोला तो बताओ किधर ले चलूँ।
       सुधा के ताऊजी पुलिस के बड़े अधिकारी थे। उसने उनका नाम लेते हुए कहाँ कि उसे पुलिस स्टेशन ले चले। वही से वह उनके घर जायेगी। जहाँ उसने जाना था वहाँ के थाने का नाम लिया। थोड़ी देर में ही वह पुलिस स्टेशन के सामने था। उसके ताऊजी पुलिस अधिकारी तो थे लेकिन वे वहाँ कार्यरत नहीं थे।
       अब सुधा ने कहा कि  रिक्शा आगे बढ़ाये और वह घर ही जायेगी। ऊपर से मज़बूत दिखने का ढोंग करती सुधा मन ही मन बहुत डर गयी थी। घर का रास्ता ही भूल गयी। सुबह 10 बजे की हॉस्टल से  निकली सुधा को डर के साथ भूख भी सताने लगी थी। दोपहर के दो बजने को आये थे।
   अब तो रिक्शे वाला भी चिढ़ गया था। बोला कि जब उसे घर का पता नहीं था तो वह आयी ही क्यूँ ? तभी उसे थोड़ी दूर पर ताऊजी के घर के आगे गार्ड्स दिखाई दिए। राहत की  साँस सी आई और रिक्शा वही ले जाने को कह दिया। घर के आगे पहुँच कर  उसने रिक्शा वाले को 7 रूपये देने चाहे तो वह रुहाँसा हो कर बोला मालूम भी है कितने घंटे हो गए हैं।
   सुधा बोली ,"तेरी गलती ! मैं क्या करूँ तू गलत ले कर ही क्यूँ गया ! सामने गार्ड्स दिख रहे हैं क्या ? उनको बताऊँ तेरी हरकत , मैं तो ये सात  रूपये भी नहीं देने वाली थी। चल जा यहाँ से। "
वह चुप करके रूपये ले कर चलता बना।
    सुधा का मन था कि काश आज माँ सामने होती और गले लग कर सारा डर दूर कर लेती। बाद में ताईजी को बताया तो उन्होंने कहा भी कि उसे जाने क्यूँ दिया। उसकी शिकायत करनी थी।  तब तो  उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था और वह यह सोच ही नहीं पाई थी । तब ताईजी ने कहा कि जो बात हुई नहीं उस पर विचार मत करो और सोचो कि तुमने आज सात रुपयों में आधा शहर घूम लिया। दोनों हंस पड़ी इस बात पर।
     सोचते -सोचते वह मुस्कुरा पड़ी। यह एक पल ही होता है जो इंसान को अच्छे या बुरे वक्त में धकेल देता है। फिर भी खुद की  सावधानी जरुरी तो है ही।


उपासना सियाग

Monday, December 9, 2013

मैं ऑक्टोपस क्यूँ ना भई

' मैं ऑक्टोपस  क्यूँ ना भई '.... शीर्षक पढ़ कर चौंकिएगा नहीं। एक गृहिणी जो सुबह से लेकर शाम तक , नहीं शाम तक नहीं ! आधी रात तक खटती हो , वह यह जरुर मानेगी कि उसके ऑक्टोपस कि तरह बहुत सारी भुजाएं क्यूँ ना हुई।
   हम माएं अपने बच्चों को लाड -प्यार में इतना बिगड़ देती हैं कि वो कुछ भी काम नहीं करेंगे। सब कुछ उनको उनके पास ही पहुँच जाए। केवल बच्चों को ही क्यूँ हम तो हमारी सासु माँ के बिगड़े हुए बच्चे को भी आज्ञाकारी पत्नी बन कर सर चढ़ा लेती हैं।
    नहाने जाओ तो ' माँ तौलिया देना। मेरे जूते  तो पॉलिश कर दो। बस आज -आज कर दो कल से पहले ही कर दिया करेंगे। मेरी प्यारी मम्मा कपडे भी निकल दो अलमारी से। आप कितनी अच्छी हो। ' रोज़ के डायलॉग है बच्चों के ! और मैं कभी उनके  प्यार में , ममता और कभी मक्खनबाजी से उनको और बिगड़ती रहती हूँ। उनका तो कल कभी नहीं आया।
   यही हाल पति देव का भी ! उनके कपडे  सफ़ेद कड़क स्टार्च वाले होने चाहिए। मज़ाल है कि कोई धब्बा भी रह जाये। कोई रह भी जाये तो फिर गले से इतनी मधुर आवाज़ ( हाँ , मधुर ही ! उनको जोर से चिल्ला कर बोलना नहीं आता )निकालेंगे कि दिल बैठ जायेगा की  जरुर कोई नुक्स है। मैं जरुर जोर से चिल्ला  पड़ती हूँ कि  नहीं मैं नहीं आउंगी ! कोई नुक्स है तो एक तरफ रख दीजिये। फिर से धो दूंगी।
   पति जी तो सुबह एक घूंट चाय के साथ शुरू हो जाते हैं कि ये नुक्स है या फिर से बना कर लाओ। अब सुबह -सुबह इनके नखरे उठाऊं या बच्चों को देखूं। तब मन करता है कि भगवन को पुकारूँ कि उसने मुझे औरत तो बना दिया फिर  ऑक्टोपस की तरह कई सारी बाजू क्यूँ ना दी।
  खाना खाने बैठेंगे तो भी नखरे।  जो बना है उससे संतुष्टि नहीं। चलो कभी होता है कोई फरमाईश कर दी कि ऐसे नहीं वैसे बना था। नहीं जी ! यहाँ तो कुछ भी खाना हो वह खाना सामने आने के बाद ही नखरे और नुक्स शुरू होते हैं। अपनी मर्ज़ी से थाली में डाला तो ये तो मैंने खाना ही नहीं था। थाली आगे रखते ही बोलेंगे। जाओ आज तो दही कि लस्सी बनाओ। या लस्सी बना दो तो आज तो रायता खाना था। पहले पूछो तो बोलेंगे कि पहले सामने लाओ फिर देखूंगा और बताऊंगा कि तुमने क्या -क्या बनाया है। चटनी रखो तो आज मैंने हरी मिर्च खानी थी वह भी तवे पर तड़की हुई। मिर्च लाओ तो उनको आचार खाना होता है। एक मिनिट भी सांस तो क्या ले कोई। खाना खाते हुए  जाने कितने चक्कर लगवाते हैं।
   एक दिन मैंने भी सोचा कि आज एक भी चक्कर नहीं लगाऊंगी। थाली में खाना रखा और एक ट्रे में सब कुछ रखा जिनका कि मुझे अंदेशा था कि वो क्या -क्या खा सकते हैं। मैंने खाना रखते हुए( साथ में ट्रे भी ) बोली कि आज मैं एक भी चक्कर नहीं काटूंगी। आपके लिए सारा सामान इस ट्रे में है। मेरे भी पैर दर्द कर रहे हैं। अभी बच्चे आ जायेंगे। जम कर बैठ गयी कि आज नहीं उठूंगी।
   उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई और जोर से हंसी आ गयी कि एक चक्कर तो कटना पड़ेगा। मैंने बुरा सा मुहं बनाया तो हँसते हुए बोले कि मैं चम्मच तो रखना ही भूल गयी। अब उठना तो पड़ा लेकिन रोकते हुए भी हंसी आ गई।
     जीवन में यह सब तो चलता रहता है। बच्चों और पति और बाकी घर वालों के लिए काम करना सच में मन को सुकून देता है।  बस अपनी वेल्यू नहीं भूलना चाहिए।
जो भी है खूब है।  और दोष भी किसका ! मैंने ही शिव जी से ऐसा नखरे वाला वर मानेगा था। 

Tuesday, December 3, 2013

जीवन के रंग

       यह हमारा जीवन चलते -चलते ना जाने  कब क्या मोड़ ले लेता है कोई नहीं जानता।  मैं एक सामान्य गृहिणी , जो कि बेलन -कलछी चलाने तक ही सिमित थी। जिसे रचना 'र ' और कलम का ' क ' भी नहीं लिखना आता था , उसकी रचना भी छपेगी सोच नहीं था कभी। विज्ञान की छात्रा का कलम से क्या वास्ता। कलम उठाई भी तो बच्चों को पढ़ाने या राशन के सामान की  लिस्ट बनाने के लिए या घर में काम करने वालों , दूध -अखबार या सब्जी का हिसाब करने के लिए ही।  हां ! कभी कभार बच्चों को स्कूल के लिए कुछ लिख कर दिया वह बात अलग है। एक दिन एकाकीपन से तंग हो कर फेसबुक पर प्रोफाइल बनाया वह भी देर रात को ,बच्चों को फोन पर पूछ कर।
   8 जून 2011 को पहली कविता लिखी। वह भी तब , जब  मुझे कॉपी-पेस्ट करना भी नहीं आता था। कम्प्यूटर पर हिंदी लिखना भी नहीं आता था। मोबाइल से लिखी थी। फिर धीरे -धीरे कदम बढ़ाना सीखा। चुनौतियों को स्वीकार कर उनको पार करना मुझे बहुत भाता है।
  मुझे प्रेरित करने वाले श्री रविन्द्र शुक्ला जी अब इस दुनिया में नहीं है। उन्होंने मुझ सहित कई प्रतिभाओं को प्रेरित किया है।उनको निजी तौर पर नहीं जानती। एक अनजान व्यक्ति आपको प्रेरित करता है  तो  उसे


ईश्वर का भेजा हुआ दूत ही समझना चाहिए। मैं आस्तिक हूँ और ईश्वर कि सत्ता में पूर्ण विश्वास करती हूँ तो मुझे मेरे ईश्वर ने घुट -घुट कर मिटने से पहले ही उबार लिया।
  ऐसा नहीं है कि मुझे जिंदगी से कोई शिकायत रही है।  जो दिल से चाहा वह मिला मुझे। हाँ ! जो नहीं मिला वह   दिल से नहीं  माँगा मैंने शायद। जब इंसान कि बुनियादी जरूरतें हाथ बढ़ाने से पहले ही पूरी होने लगे तो इंसान एक अवसाद में आ जाता है। मेरे लेखन ने मुझे फिर से जीवन दान सा दिया है जैसे !
    सबसे पहले जब " स्त्री हो कर सवाल करती है " काव्य संग्रह के लिए रचनाएं भेजनी थी तो मुझे मेल भी नहीं करना आता था। तब मैंने शोभा मिश्रा जी का सहयोग माँगा। उन्होंने बहुत अच्छे से समझाया तो मैं मेल कर पाई। बाद में शोभा जी ने मुझे ब्लॉग बनाने में भी सहायता की।
  उसके बाद मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। मेरी कुछ कहानियाँ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई है। मेरे लेखन कि वजह से सबसे अधिक प्रसन्न मेरे पापा और मेरी माँ है। मेरे पापा ने बहुत प्यार से सर पर हाथ फिराया जैसे कह रहे हों बेटियां भी नाम रोशन कर सकती है। मेरे भाई नहीं है चार बहने ही हैं हम। पापा मेरी साडी कहानियां कवितायेँ पढ़तें है और समीक्षा भी करते हैं।

  आज जब गुलमोहर साँझा काव्य संग्रह मेरे हाथ में आया तो मैं बहुत अभिभूत हुई। इससे पहले मेरी कुछ कवितायेँ , " स्त्री हो कर सवाल करती है " और  " पगडंडियां "काव्य संग्रह में भी छपी है।
 आज मैं रविन्द्र शुक्ला जी , माया मृग जी , लक्ष्मी शर्मा जी ,अंजू चौधरी जी और मुकेश कुमार सिन्हा जी , शोभा मिश्रा जी और मेरी प्रिय सखी नीलिमा जी का भी (जिन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया , चैट बॉक्स में आ कर। नीलिमा जी हमेशा मुझे सही राय देती है )सभी को शुक्रिया करती हूँ जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित किया है। और आप सभी का भी जिन्होंने मेरी लिखी हुई रचनाये पढ़ी और  सराहना कर के हौसला दिया।

Sunday, October 13, 2013

नहीं बंटेगा मम्मी -डैडी का प्यार "

       राधिका जी बैचैनी से टहल रही थी।  ऑफिस से आते ही माधव जी ने देखा आज फिर बैचेनी की लहर है पत्नी के चेहरे पर।   सोचने लगे कारण  क्या हो सकता है भला। सुबह तो सब ठीक -ठाक  ही था। अब फिर क्या बात हो सकती है।  बच्चे भी अपने -ठौर ठिकाने पर सकुशल है। सुबह सब से एक बार बात हो जाती है। वे दोनों पति -पत्नी भी आराम से एक अच्छी और स्वस्थ जिन्दगी बिता रहे हैं।
फिर क्या बात हो सकती है आज ! ये बैचेनी क्यूँ ?

छ्नाअक्क्क  "……!

जोर से शीशा टूटने की आवाज़ आयी। जैसे किसी ने  गिलास को जमीं पर दे मारा हो और वह कांच का गिलास टूट कर बिखर गया।
          माधव जी कुछ पूछने से पहले ही समझ गए राधिका जी की बैचेनी का राज़। आज फिर झगडा हुआ लगता है सुष्मिता और अंकुश का।
   तो राधिका को क्या ? कोई अपने घर में लड़े -झगड़े !
कोई क्या कह सकता है और क्यूँ कहे कोई उनको ?

सुष्मिता और अंकुश अपनी पांच वर्षीय बेटी मालू के साथ उनके उपर वाले पोर्शन में किराये पर रह रहे थे। पहले उनके बेटा -बहू थे वहां। जब से बेटे का तबादला दूसरे  शहर में हुआ तब से किराये पर दे रखा है।
         बहुत प्यारी जोड़ी है दोनों की। दोनों ही नौकरी करते हैं। बेटी को पहले क्रेच में छोड़ा करती थी सुष्मिता । अब स्कूल लगा देने के बाद थोड़ी देर मालू यानि स्कूल का नाम मालविका को राधिका जी संभाल लिया करती है।
          राधिका जी को उनकी हर बात पसंद है। कोई शिकायत नहीं वैसे तो उनसे। लेकिन यह झगड़ने वाली बात सख्त ना पसंद है। महीने में एक बार तो जम  कर झगड़ा होता ही है। और तब  तक झगड़ते रहेंगे  जब तक की मालू डर  के मारे  रो ना पड़े। थोड़ी ही देर में ऐसे हँसते हुए बाहर  निकल पड़ते जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
     शादी को सात  साल हो गए हैं उनको। सुष्मिता के विचार थोड़े उग्र और नारी वादी हैं। वो सोचती है उसे कोई दबा नहीं सकता। वह अपने पैरों पर खड़ी  है तो वह किसी से दब नहीं सकती ना ही किसी का सहारा उसे चाहिए। अंकुश के विचार समझोता वादी  थे। इसलिए निभ रही थी अच्छे  से। दोनों एक दूसरे  का सहयोग करते हुए गृहस्थी चला रहे थे।
    दो महीने पहले सुष्मिता का प्रमोशन हो गया तो उसके ऑफिस में थोडा काम बढ़ गया। जिम्मेदारी बढ़ी है तो काम और उससे होने वाले तनाव में बढ़ोतरी तो होगी है। इस कारण थोड़ी सी चिडचिडी से भी हो गयी। हर छोटी सी बात पर तुनक जाना उसकी आदत बनती जा रही थी। अब उनके झगड़े बढ़ते  ही जा रहे थे हर रोज।
     आज तो बर्तन तक तोड़े जा रहे हैं। बात उनकी क्या है यह समझ नहीं आ रही लेकिन दोनों एक स्वर में बोल रहे हैं कि अब उन दोनों का एक साथ रहना मुमकिन नहीं है। अब वे तलाक ले लेंगे जल्दी ही।
   उफ़ ये तलाक शब्द कितनी जल्दी इस लोगों की जुबान पर आ जाता है। राधिका जी फिर से बैचेन हो गयी।  कुछ सोचते हुए एकदम से उठी। उपर की तरफ जाने वाली सीढ़ियों की तरफ लपकी। माधव जी ने रोक कर कहना चाहा कि यह उनका अपना मामला है हमें क्या करना ?
" यह मामला अब मेरा भी हो गया है ना केवल उनका ! उनके बड़े उनके साथ नहीं रहते तो इन लोगों ने बेशर्मी ही धारण कर ली। ना हमारी परवाह ना मासूम सी मालू की परवाह। अब मैं उनको ऐसे लड़ने नहीं दे सकती। " राधिका जी सीढियां चढ़ती हुई  बोली।
      राधिका जी ने दृश जो देखा तो एकबार हंसने को हुई। दोनों के एक -एक गिलास हाथ में ले रखा था। बारी  -बारी से तोड़ने को तैयार थे। बात कुछ भी नहीं थी बस छोटा -मोटा अहम् ही आड़े आ रहा था। उनको देख कर दोनों ही एक दम सकपका गए और झेंप भी गए। 
    राधिका जी ने शांत किन्तु तनिक रोष से कहना शुरू किया कि उनकी ये हरकत बहुत खराब लगी है उनको। झगड़ने की आदत ही बना ली उन लोगों ने। मालू की तरफ इशारा करते हुए कहा की तुम दोनों इसका भी ख्याल करो कितना सहम गयी है। इसके दिल -दिमाग पर क्या असर पड़ेगा। यह भी सोचना चाहिए। जरा सी बात पर तलाक ले लेने की बात करना कहाँ की समझदारी है।   
      सुष्मिता बोली , " आंटी आप नहीं जानती कि मुझे दबाया जा रहा है। मैं एक औरत हूँ तो हर काम मुझे ही करना जरुरी है। जबकि हम दोनों ही कमाते है। क्या अंकुश को मेरा हाथ नहीं बंटाना चाहिए। "
  " एक गिलास पानी मांग लिया तो इनको दबाया जा रहा है। आज हम ऑफिस से साथ ही आये। और मैंने एक गिलास पानी मांग लिया। बस इनकी नारी शक्ति जाग गयी। " अंकुश ने थोडा सा खिसिया कर झल्लाते हुए बोला। 
    " यह तो छोटी सी बात है। लेकिन मुझे हर बात पर दबाया जा रहा है। हर रोज़ कोई न कोई फरमान जारी  हो जाता है। मैं औरत हूँ तो मैं ही सहन करूँ। यह भी कोई जरुरी है क्या ?" कहते हुए सुष्मिता का गला भर आया। 
      "सिर्फ अच्छा रंग रूप ,कद- काठी देख और अच्छी कमाई भी देख मेरे पापा ने इसके पल्ले बाँध दिया जिसको औरत की कोई इज्ज़त ही नहीं।" अब सुष्मिता की आँखों से आंसू ढलक आये थे 
     "अच्छा  !और तुम  !सिर्फ बाहर अच्छा काम करो और घर ना संभालो यह कहाँ की समझदारी है। मैंने कभी तुम्हे अकेले कोई काम नहीं करने दिया हर जिम्मेदारी तुम्हारे साथ ही निभाई है। आज एक गिलास पानी ही तो माँगा था। इसमें तुम्हारे अस्तित्व को कहाँ दबाया जा रहा है !" अंकुश को सुष्मिता के आंसूं देख कर खीझ हो आयी।  
      राधिका जी को अब बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा सात साल होने को आये साथ रहते हुए उन लोगों को और अब वे लोग तलाक  की बात कर रहे है। 
 वो नाराज़गी से बोली , " ये झगड़ा आज खत्म करो और बातचीत से तय कर लो कि तलाक लेना है या साथ रहना है। 
फिर दोनों के हाथ पकड कर  उनके कमरे में ले गयी। बाहर आ कर कमरा बंद करते हुए बोली कि आज दोनों  अच्छी  तरह सोच विचार ले कि आगे क्या करना है। तब कर यह दरवाज़ा बंद ही रहेगा। तुम दोनों का खाना पीना सब बंद। मालू को साथ ले कर नीचे आ गयी। 
     माधव जी ने समझाया भी कि यह ठीक नहीं है। उनका आपसी मामला है। लेकिन राधिका जी बोली कि नहीं उनको हमारे साथ रहते हुए तीन साल हो गए। वे हमारे अपने बच्चों जैसे ही है। मैं उनको ऐसे लड़ने नहीं दूंगी। 
         उधर अंकुश और सुष्मिता क्या फैसला करते। यह झगड़ा तो उनकी रोज़ की दाल  -रोटी बन गयी थी। दोनों ने एक दूसरे  की तरफ देखना भी गवारा नहीं किया। अंकुश बेड  पर चुप बैठ गया। सुष्मिता जमीन पर ही बैठ गयी।  
     " जमीन पर क्यूँ बैठी हो , कुर्सी पर ही बैठ जाओ। " अंकुश ने कहा। उसके शब्दों में कोई भाव नहीं थे बस ऐसे ही कह दिया। 
    " नहीं ! मैं औरत हूँ  ! पैर की जूती  ही रहूंगी। इसलिए मेरी जगह जमीन ही है। तुम क्यूँ चाहोगे की मैं तुम्हारे बराबर बैठूं। " सुष्मिता तुनक उठी। 
  " अब औरत पैर की जूती  है , वाली बात कहाँ से आ गयी। मैं तुमसे भर पाया जो तुम चाहो मेरा वही फैसला है। " अंकुश मुहं -पीठ घुमा कर लेट गया। 
    सुष्मिता भी ऊँघने लगी बैठी -बैठी। सर घुटनों पर टिका लिया। 
   थोड़ी देर में एक गाने की आवाज़ से उन दोनों की नींद टूट सी गयी। दोनों खिड़की के पास आ गए और सुनने लगी। 
     यह संयोग ही था कि  बाल दिवस पर मालू को एक गीत तैयार करवाना था। जिसे राधिका जी तैयार करवा रही थी। उसे ही मालू गा रही थी अपने माँ -पापा के झगड़े से बेखबर। 

 वह गा रही थी , " एक बटा  दो , दो बटे चार , 
                             छोटी -छोटी बातों में बंट गया  संसार।  
                                नहीं बंटेगा , नहीं बंटा है , 
                                 मम्मी -डैडी  का प्यार ....."

   बहुत प्यारी सी भोली सी आवाज़ में गा रही थी और बेखबर सी खेल भी रही थी मालू। 
सुष्मिता सुन कर रो पड़ी। अब उसके पास कोई भी शब्द नहीं थे कि वह क्या कहती। अंकुश ने धीरे से उसके कन्धों पर हाथ रह कर बोला , " सुशी , तुम चाहे कितना भी झगड़ा करो लेकिन गुस्से में ,नाराज़गी में मेरी तारीफ़ ही करती हो।  "
 वह रोना भूल कर अंकुश की तरफ देखने लगी।  
" हां ! वो सुन्दर रंग-रूप , अच्छी कद -काठी। मैं कितना तो अच्छा लगता हूँ तुमको।  तुम फिर भी मुझसे तलाक लेना चाहोगी। "   अंकुश के बोलने के अंदाज़ से सुष्मिता को हंसी आ गयी। वह खिलखिला कर हाँ पड़ी। 
 तभी राधिका जी उनकी खोज खबर लेने आयी तो दोनों को हँसते देख वह कुछ आश्वस्त हो गयी। दरवाज़ा खोल दिया। चेतावनी भी दे डाली कि अब वे तब तक बात नहीं करेगी जब तक वे झगड़ना बंद नहीं करते।  वे दोनों सिर्फ मुस्कुराए। और झगडा ना करने का वादा नहीं किया।  



Wednesday, September 11, 2013

एक लेखिका की मौत

        एक लेखिका की  मौत ....

 ' हाँ , रखूंगी  अपना ख्याल ! अच्छा दीदी  …. ! बाय। " कहते हुए वसुधा ने फोन बंद  किया। फोन हाथ में लिए बहुत गौर से उसे  देख रही थी , मानो जो  खुशखबर उसकी दीदी ने उसे दी है वह अभी भी फोन से महक रही है। सोचने लगी कि उसने तो ऐसा कभी सोचा ही नहीं कि वह कुछ लिखेगी और लोग उसे पढेंगे। आज दीदी ने बताया की उसकी लिखी कहानी एक पत्रिका में छप गयी है।
        घर -गृहस्थी में व्यस्त , सबका ख्याल रखती और सदा अपने में ही मगन रहने वाली वसुधा कब लिखने लगी। पता ही ना चला उसे। एक डायरी में अपने ख्याल -विचार लिखती रहती थी। वह डायरी उसकी दीदी के हाथ लग गई। जब वह पिछली गर्मियों की छुट्टी में आई थी।  उनके प्रोत्साहन से ही उसने लिखना भी शुरू किया। 
      पहले -पहल जब उसने डायरी में लिखना शुरू किया तो अपने परिवार की अन्य महिलाओं को भी दिखाती थी और राय  मांगती थी। मगर वह मन ही मन कट कर रह जाती कि वो महिलाएं जोकि उसको जानती है फिर भी उसकी लिखी हुई रचनाओं में ना जाने क्या राज़ तलाशती है।  उनके व्यंग्यात्मक भाव वाले चेहरे और शक भरी निगाहों ने उसके उत्साह को तोड़ ही दिया। वह सोचती कि ऐसा क्यूँ सोचती है वे  सभी।  कोई भी अपने बारे में क्यूँ लिखेगा भला ! कोई भी इन्सान जो भावुक और संवेदनशील है वह कोई भी घटना को अपनी कलम के द्वारा उभार सकता है।  हर बार उसके लेखन में उसके व्यक्तिगत जीवन को क्यूँ घसीटा जाता है।  उसके बाद जब भी उसे फुर्सत मिलती लिख डालती लेकिन खुद तक ही सिमित रखती। 
     और आज तो जैसे उसके पंख ही लग गए हों। पैरों में जैसे घुंघरू ही बांध गए हो। उसकी अभिव्यक्ति को नया आसमान मिल गया था । वह खुश थी कि अब उसके शब्द अब डायरी के पन्नो में कैद नहीं रहेंगे। उसके शब्दों को नया आसमान मिल गया है।  उसके गालों पर खुशियों के इंद्र -धनुष खिल गए जैसे।  भाव विभोर हो कर उसने आँखें बंद कर ली। 
       " ये रोहन , अमित , राघव आदि -आदि कौन है ? " एक जोरदार कड़क आवाज़ से उसकी आँखे खुल गई। सामने संजीव खड़ा था हाथ में उसकी डायरी ,आँखों में शक और बहुत सारे  संदेह के साथ सवाल लिए। वसुधा अपने पति का ऐसा रूप देख सहम सी गयी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले।  
कुछ बोलने को हुई कि संजीव बोल पड़ा , " ये तुम्हारे विवाह से पहले के दोस्त हैं या बाद के , या दोस्ती से कुछ ज्यादा रहा है उनसे। " 
       वसुधा सन्न रह गई कि उसे एक दिन यह भी सुनना पड़ेगा।उसका लेखन उसके लिए  कलंक का कारण  जायेगा , यह तो उसने नहीं सोचा था ! उसने संजीव  समझाने की कोशिश भी की। लेकिन वह नहीं समझा। बहुत कुछ कह गया उसे , डायरी को जोर से उसके सामने पटक कर  गया।
      वसुधा की ख़ुशी तो पल भर की ही साबित हुई।  उसे बहुत जोर से रुलाई फूट पड़ी।  इतने बरसों के  साथ में यह इन्सान मुझे जरा भी समझ नहीं पाया।


" किसी की व्यथा को अगर वह अपनी लेखनी में ढाल लेती है तो क्या बुरा है ! " सोचती रही और रोती  रही।
रोती रही तो रोती रही ! चुप कौन करवाता ?
       कुछ देर बाद वह कुछ सोच कर उठी और छत पर गयी। हाथ में उसके डायरी थी उसकी।  वह डायरी ही नहीं थी उसकी बल्कि वह तो उसकी आत्मा थी। जोकि उसे , उसके होने का  पता देती थी। आज उसे वह अपने से दूर करने जा रही थी। थोड़ी ही देर में उसके हाथो में उसकी कराहती आत्मा थी ,चिंदी-चिंदी टुकड़ों में ! जाने डायरी चिंदी -चिंदी थी या वह और उसकी लहुलुहान आत्मा।
      आग में जलती डायरी में वसुधा ने जैसे खुद को ही जलते देखा।  वह रो पड़ी अपनी ही मौत पर।

----उपासना सियाग



    

Sunday, August 11, 2013

धूप छाँव

कई दिनों  अस्वस्थ चल रही थी  कनिका। चल क्या रही थी महसूस ज्यादा कर रही थी मन से । और फिर रात वाली बात ने भी उदास कर दिया। आज सुबह बिस्तर पर से  उठने को मन ही नहीं कर रहा था उसका। रात की घटना पर सोच रही थी। बात कोई बड़ी भी नहीं थी।  ऐसे ही हंसी  मजाक की बात को दिल से लगा बैठी थी वह। यह विचार उसके पति के थे। लेकिन क्या वह सचमुच मजाक था या उसकी अवहेलना ही थी।
   पिछली रात को वह बच्चों के साथ बैठी बात कर रही थी। उसने बातों ही बातों में कहा , " एक औरत माँ और बाप दोनों की जगह ले सकती है लेकिन पिता , माँ की जगह नहीं ले सकता। "
इस बात पर दोनों बच्चे एक साथ बोल पड़े। " नहीं , आप गलत हो इस बात पर  …. ! आपको क्या मालूम कितने काम होते हैं बाहर के , कमाई करनी होती है ,बैंक जाना होता है और भी कितने काम होते हैं , खाने का क्या नौकर रख लो  … .! "
" और नहीं तो क्या ! कपड़े धोने के के लिए वाशिंग मशीन है ना  …! " बच्चों के पापा ने भी सुर में सुर मिलाया।तीनों ने हाथ पर हाथ हुए जोर से ठहाका लगाया।
" अच्छा तो मैं सिर्फ खाना और कपडे धोने के लिए ही हूँ ? मेरी यही कीमत है  ? अरे सारा जीवन गला दिया तुम लोगों के लिए और आज  हो  …… ! " आगे के स्वर रुंध गए।
 नाराज़ हो कर अपने कमरे में  गयी।  बच्चों ने पुकारा लेकिन अनसुनी कर , चुप हो बिस्तर पर जा लेटी।   आँखों से आंसू बह निकले।
 पति ने भी समझाया कि एक औरत से ही घर बनता है। तुम हो तो हम है।  यह तो ऐसे ही हंसी -मजाक की बात थी।  लेकिन बात तो दिल पर तीर की तरह लगी थी।
" माँ , यूनिफार्म तो निकाल दो।  नाश्ते में क्या दोगी। आज उठना नहीं है क्या ? स्कूल को देर हो जाएगी हमें।
एक बार तो गुस्से में कुछ बोलने वाली थी। लेकिन सुबह ही सुबह वह बात बढ़ाना नहीं चाहती थी।
बच्चों को स्कूल भेज कर उसने पति से कहा की वह आज डॉक्टर  को दिखा ही आये।  जल्दी से काम निपटा कर सोचा कि जब तक बच्चे स्कूल से आयेंगे तब तक वह लौट आएगी।
लेकिन वहां भीड़ होने के कारण उसे थोड़ी देर लगने वाली थी। ध्यान फिर से रात की बात पर चला गया और खुद की अहमियत पर भी। तभी बेटे का फोन आ गया कि उसे क्या हुआ है और इतनी देर क्यूँ लग रही है डॉक्टर के पास। उसने भीड़ होने की बात कही और फोन काट दिया। लेकिन बेटे की आवाज़ में उसके लिए चिंता मन ही मन सुकून दे गयी और रात को लगे दिल पर घाव पर थोडा मलहम भी लगा गयी।
 घर पहुँच कर देखा तो बच्चे टीवी देख रहे थे।  आज जूते , युनिफोर्म और बेग भी अपनी जगह पर थे। बच्चों को लगा था की आज माँ की तबियत शायद ज्यादा खराब है तो वह उसका काम बढ़ाना नहीं चाहते थे। वह जल्दी से हाथ -मुहं धोकर रसोई में गयी की जल्दी से खाना बना दूँ। सब्जी बना कर गयी थी बस फुलके ही सेकने थे।
रसोई में जा कर देखा तो आज फुलके बाज़ार से आ गए थे बस उसी का इंतजार हो रहा था।
" माँ , डॉ ने क्या कहा ? आपके क्या हुआ है ? " छोटे बेटे ने पास आ कर गले लगते हुए कहा।  कनिका का मन भीग गया।  उसने कहा की डॉक्टर ने कहा की केल्सियम की कमी है ज्यादा कोई डरने वाली बात नहीं है।
" लो  इसमें डरने वाली बात नहीं तो क्या बात है , आपको मालूम है की इसकी कमी से हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती है और आप कहते हो कि.…. , छोटे बेटे ने बात अधूरी छोड़ दी।
" आपको दूध पीना चाहिए जिससे आपकी केल्सियम की कमी पूर्ति हो सके  ," बड़े बेटे ने भी सुर में सुर मिलाया।
इतनी चिंता इतना प्यार देख वह रात वाली बात भूल गयी और सोचने लगी कि यह धूप छाँव तो जिन्दगी का हिस्सा है। थोड़ी देर में सारा परिवार खाना खा रहा था और किसी बात पर हंसी -मजाक भी चल रहा था।



Tuesday, July 9, 2013

महिला दिवस

महिला दिवस

सुबह का समय। दो सहेलियाँ आपस में मिली।
पहली बच्चे को स्कूल बस में बैठाने आयी थी। दूसरी एक स्कूल की शिक्षिका थी। दोनों ही सहेलियां थी।


शिक्षिका सहेली ने अपनी सहेली के  गले लगते हुए बोली , " हैप्पी वुमन्स डे ...,"

पहली ने हंस कर कहा " सेम टू  यू ...!
अरी  धीरे बोल ...! काम वाली ने सुन लिया तो छुट्टी कर के बैठ जाएगी ...!"
दोनों हँस पड़ी ....



Saturday, June 15, 2013

आशंकाओं की बदली ....

विक्रम ,सुधीर जी को कोटा से बस में बैठा कर , अपने बड़े भाई सुमेर को फोन किया कि  उसने बाबूजी को बस में बैठा दिया  और बस रवाना हो गयी है। बस शाम 4 बजे तक इंदौर पहुँच जाएगी ।
      बाबूजी को हमेशा वह कार से ही छोड़ने जाता है। इस बार उसकी पत्नी शानू की छोटी बहन आने वाली थी तो कार की जरूरत उसे थी। बाबूजी का जाना भी जरुरी था क्यूँ की सुमेर के बच्चों ने जिद की कि  इस बार दादा जी होली उनके साथ ही मनाये।
    लेने को तो सुमेर भी आ सकता था लेकिन उसके ऑफिस में बहुत काम था सो वह छुट्टी नहीं ले सका। सुधीर जी ने कहा कि  वे बस पर चले जायेंगे उनको कोई असुविधा नहीं होगी , ४ -५ घंटे का ही तो सफ़र है और आज कल बस का सफर भी आराम दायक हो गया है। आखिरकार उनको बस में भेजना ही तय हुआ।
    तीन साल हुए विक्रम-सुमेर की माँ का स्वर्गवास हुए तब से दोनों भाइयों ने पिता की देखभाल में कोई कसर नहीं रखी है। ना केवल जरूरतें पूरी करना ही बल्कि उनकी हर बात सुनना और राय  भी लेना भी नहीं भूलते। उनका जहाँ मन करता उसी बेटे के पास कुछ दिन रहने को चले जाते। पिछले तीन महीनों से वे विक्रम के पास थे।
        सुमेर ने बच्चों को जैसे ही कहा कि उनके दादा जी चल पड़े हैं तो जैसे एक ख़ुशी की लहर सी दौड़ पड़ी हो , उनके मन और घर दोनों में। नन्ही सोमाया झट से लॉन में पहुँच गयी और सोचने लगी कि दादा जी के लिए एक गुलदस्ता ही बना लूँ। दादा-पोती दोनों को ही फूल बहुत पसंद है। अब अवि भी सोच में पड़ गया कि वह दादा जी के स्वागत के लिए क्या करे कि दादा जी खुश हो जाये। बहू  रीना भी खुश थी पिता जी के आने की खबर सुन कर।
       जहाँ सुमेर के घर में दादा जी से आने वाली खुशियों का इंतजार हो रहा था , वहीँ विक्रम के घर में उदासी थी . रविवार का दिन ही तो मिलता था छोटी टुनिया और अभिषेक को दादा जी साथ सारा दिन बिताने को। दादा जी भी तो ज्ञान के भंडार थे और हंसी-मजाक करके सभी का मन बहला दिया करते थे।अब वे सिर्फ इंतजार ही कर सकते थे सिर्फ उन दिनों का जब दादा जी उनके पास फिर से रहने आयेंगे। टुनिया तो माँ से शिकायत भी कर बैठती कि वे सभी इक्कठे क्यूँ नहीं रह सकते हैं। लेकिन दोनों भाइयों की नौकरी ही ऐसे थी कि एक जगह रहना संभव ही नहीं था।
          खैर शाम के 4 बज गए। सुमेर दोनों बच्चों समेत बस-स्टेंड पहुँच गया। दूर से बस को आती देख खुश हो गए  सोमाया और अवि।लेकिन यह क्या ...! यह तो वह बस ही नहीं थी जिसमे सुधीर जी ने आना था।थोडा और इंतजार किया गया। सुमेर ने पिता को फ़ोन लगाया तो स्विच -ऑफ था। चिंता में पड़  गया सुमेर ...!
  विक्रम को फोन किया तो वह भी चिंता में पड़ गया कि यह क्या हुआ ? बाबूजी पहुंचे क्यूँ नहीं ...!
    सुमेर ने पूछा कि क्या उसने बस का नम्बर नोट किया था। विक्रम के मना करने पर वह जैसे उस पर बरस ही पड़ा उसकी लापरवाही पर।
         सभी फिक्रमंद हो गए की अब क्या किया जाये। बस को राह  में जंगल से भी गुजरना पड़ता है। ना जाने वहां क्या हुआ होगा ? डाकुओं की कार्य गुज़ारी की सम्भावना को नाकारा नहीं जा सकता था। सोच कर ही दोनों भाइयों का कलेजा मुहं को आ रहा था। सुमेर को पछतावा हो रहा था कि  आज तो रविवार था वह समय निकाल कर बाबूजी को खुद लाने जा सकता था। उससे यह भूल कैसे हो गयी। ना वह घर जा सकता था और ना ही वह बच्चों को इतनी देर साथ रख सकता था। बच्चे भी बार -बार पूछ रहे थे की दादा जी कब आयेंगे।
     उधर विक्रम परेशान ...! बस -स्टेंड गया , पूछताछ से कोई तसल्ली -बक्श जवाब नहीं मिला। और कहीं बस नहीं चला तो पत्नी पर ही खीझ उठा। शानू शायद तमक कर जवाब देती लेकिन अब तो वह भी चिंतित हो उठी थी और चुप रह गयी। कहीं न कहीं वह भी अपने को अपराधी मान रही थी की शायद यह उसकी वजह से हो रहा हो। फिर बोली , " अगर हम पिता जी को टैक्सी से ही भेज देते तो ठीक रहता। "
 विक्रम ने भी यह बात मानी। लेकिन अब क्या हो सकता था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए।
उसे बचपन की घटना याद आयी जब वे दोनों भाई पिकनिक पर गए और राह में बस खराब हो जाने के कारण वे एक घंटे घर देर से पहेंचे थे और  बाबूजी को दरवाजे पर ही खड़ा पाया और माँ घर में चिंतातुर बैठी थी। कारण पता लगने पर पिता जी ने अगले दिन स्कूल जा कर प्रिंसिपल से शिकायत भी की थी।लेकिन वह अब किस्से क्या शिकायत करे।
बार -बार पिता जी को फ़ोन लगा रहा था और हर बार वही जवाब "स्विच -ऑफ ...!"
     सुमेर बच्चों को छोड़ कर फिर से बस स्टेंड आ गया। पूछताछ से भी कोई संतुष्टिदायक जवाब नहीं मिला।हार कर वहीँ बैठ गया एक बेंच पर।
        और बस क्या हुआ जिसमे सुधीर जी आ रहे थे ...!
   बस सच में ही खराब हो गयी थी। वह भी जंगल से गुजरते हुए। वहां किसी भी फोन के लिए नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। सुधीर जी को पता था कि  बच्चों को चिंता थी लेकिन वे भी क्या करते। बस ड्राइवर भी क्या करे। कोई पास से वाहन वहां से गुज़रे  तो उस पर शहर जाए और मेकेनिक को लेकर आये। तभी वहां से एक ट्रक  गुज़रा। ड्राईवर उसके साथ शहर तक गया और लगभग एक घंटे बाद ही आ पाया मैकेनिक को लेकर। बस ठीक होते -होते आधा -पौना घंटा तो लग ही गया। सुधीर जी के साथ -साथ दूसरे यात्री भी परेशान थे।सभी बात कर रहे थे कि  जब ऐसा रास्ता है तो एक मैकेनिक और दो सुरक्षा कर्मी भी बस के साथ होने चाहिए ।
       चार बजे इंदौर पहुँचने वाली बस चार बजे तो जंगल से रवाना हुई।


  दोनों भाई परेशान , एक -दूसरे को फोन लगा रहे थे कि कोई खबर आयी या नहीं। दोनों ही एक दूसरे को सांत्वना दे रहे थे की वे चिंता ना करें सब अच्छा ही होगा। दोनों  खुद को ही दोषी मान रहे थे के उनसे ही गलती हुई  है। सुमेर को मलाल था कि वह बाबूजी को खुद क्यूँ लेने नहीं गया तो वही विक्रम भी सोच रहा था कि  उसको ही बाबूजी को छोड़ कर आना चाहिए था।लेकिन अब तो इंतज़ार  ही किया जा सकता है।
       बस कुछ देर आगे पहुंची और नेटवर्क काम करने लगा तो लगभग सभी यात्रियों के फ़ोन बज उठे।सुधीर जी ने भी सुमेर को फ़ोन लगाया।
        सुमेर एक दम चौंक पड़ा जब देखा कि फ़ोन पर बाबूजी का नाम चमक रहा है और फोन बज रहा है। आँखे और गला दोनों भर आए ,जल्दी से फ़ोन रिसीव तो किया पर बोला ना जा सका उससे । उधर से सुधीर जी कह रहे  थे कि  बस खराब हो गयी थी ,अब सब ठीक है ,आठ बजे तक बस पहुँच जाएगी।
      सुमेर को ऐसे लग रहा था जैसे कोई बोझ उतर गया हो मन से। आँसू  पोंछ कर विक्रम को सूचना दी कि  बाबूजी ठीक हैं और आठ बजे तक पहुँच जायेंगे उसके पास। अभी छह ही बजे थे। सुमेर घर की तरफ चल पड़ा। वह सोच रहा था कि ये इंतजार के पल कितने भारी थे उसके लिए लेकिन अब आशंकाओं की बदली छंट गयी। वह मुस्कुरा पड़ा।



पालन का भाव पिता ही में आता है .........

हम सभी हमेशा माँ का ही गुणगान करते है। कविताओं में भी अक्सर माँ की महिमा का गुणगान ही होता है ,और होना ही चाहिए। हम सभी जानते है कि माँ के क़दमों में स्वर्ग है लेकिन यह भी सच है कि पालन का भाव पिता ही में आता है ,माँ अगर प्यार करती है तो पिता पालन करता है।पिता का साथ ही अपने आप में सुरक्षा का भाव आ जाता है।
      मेरे जीवन कि ऐसे कुछ घटनाएँ है जो मुझे याद रही है। एक तो कुछ वर्ष पहले जब हम छोटे बेटे को हॉस्टल छोड़ कर आने के कुछ दिन बाद जब उसे फोन किया तो मैं तो कई देर तक उसे लाड मैं ही बात करती रही ,पर जब उसके पापा ने बात की तो सबसे पहले पूछा कि" बेटे तुम्हारे कमरे का ए सी ठीक हो गया क्या ?".....(जिस दिन छोड़ने गए थे उस दिन ए सी ठीक हो रहा था उसके कमरे का ),तो यह भाव है पालन का ....! जहाँ माँ  सिर्फ लाड़ -प्यार में ही व्यस्त थी तो पिता उसकी बुनियादी जरूरतों को अधिक महत्व दे रहा था।

 
    अब दूसरी घटना मेरे बचपन की ,हमारे स्कूल के आगे एक नदी थी जो बरसात में भर जाती थी तो स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन बहुत बरसात हुई  और नदी में पानी आ गया। स्कूल में छुट्टी की घोषणा के साथ कहा गया की बस्ते यहीं छोड़ दो और घर चले जाओ।सारे बच्चे बहुत खुश थे कि एक तो छुट्टी उपर से बस्ते भी नहीं ले कर जाने।लेकिन मुझे तो पानी से डर बहुत ही लगता था , अभी भी लगता है ...!
   नदी में ज्यादा पानी नहीं था पर मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी कदम बढाने की। साथ वाली सखियों ने कहा भी कि आओ हम है न हाथ पकड़ो और चलो। मगर  मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी ,जोर से आँखे बंद कर ली। सोच रही थी कि क्या करूँ। तभी मुझे दूर से मेरे पापा आते दिखे। उनको मेरे डर के बारे में पता था। वो लगभग भागते हुए से आ रहे थे। पास आने पर में उनकी टांगों से लिपट कर जोर से रो पड़ी ,पर जो सुरक्षा का अहसास मुझे महसूस हुआ .उसका में वर्णन नहीं कर सकती।
पिता के  पालन की भावना माँ की ममता से भी बड़ी लगती है मुझे।

  और तीसरी घटना कुछ समय पूर्व की है। जब माँ ( सासू माँ ) अपने मायके गयी। अब पिता जी का सारा काम वह स्वयंम ही देखती है तो मुझे उनका काम करने की आदत भी नहीं है। वैसे भी पिता जी को बहू से बात करना पसंद नहीं है।हालाँकि  कोई काम हो तो कह भी देते हैं .नहीं तो बात नहीं करते।
   हाँ तो माँ के जाने बाद  , मैं उनको नाश्ता ,दिन का और रात का खाना तो समय पर दे देती पर रात को दूध देना भूल जाती क्यूंकि टीवी  में मग्न जो हो जाती थी। फिर पौने ग्यारह बजे याद आता ," अरे पिताजी का दूध तो रह ही गया ...!" फिर संजय जी को  ढूध का गिलास  दे कर आना पड़ता .. दो दिन तो ऐसा ही रहा।
तीसरे दिन पिताजी रात का खाना खा कर जाने लगे तो मुझे बोले के रात को 10  बजे मैं खुद ही आ जाऊंगा। संजय को ऐसे ही तकलीफ होगी।
मुझे  बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और बड़ी मुश्किल से बोली नहीं पिताजी आज मैं समय से ही दूध दे जाउंगी और उस दिन मैंने सबसे पहले यही काम किया।
    मन ही मन बहुत अभिभूत हुई एक पिता का अपने पुत्र के प्रति प्यार को देख कर जो 75  वर्ष की उम्र में भी अपने पुत्र को जरा सी तकलीफ नहीं दे सकता है।जबकि यह कोई मुश्किल काम नहीं बल्कि फ़र्ज़ भी बनता है एक पुत्र का ...
 पिता ऐसे ही होते हैं जो माँ की तरह अपना प्यार दिखा नहीं सकते पर महसूस तो करवा सकते है।


Wednesday, June 5, 2013

शक की आग ....


"बाय माँ "......अपने छोटे-छोटे हाथ हिलाता हुआ उदय  ऑटो में बैठ कर स्कूल चला गया तो  मैंने राहत की साँस ली .....उफ़  !  सुबह-सुबह की भागदौड को  एक बार राहत सी मिलती है जब बच्चों को स्कूल भेज दिया जाता है।

    उदय  एक बार बाथरूम में घुस गया तो बस फिर बाहर आने का नाम ही नहीं लेता , जब तक तीन-चार बार ना चिल्लाओ। उसे कोई परवाह नहीं है कि  स्कूल को देर हो जाएगी या ऑटो वाला बाहर खीझते हुए इंतज़ार करेगा। जोर से डांट लगाओ तो बोलेगा "जब मैं स्कूल जाता हूँ तभी स्कूल लगता है !!"मुझे हंसी और खीझ दोनों एक साथ आती और बाहर जा कर खिसियानी हंसी से ऑटो वाले को देखती हुई उदय को रवाना कर एक लम्बा साँस लेती हूँ। 

   फिर थोड़े से बिखरे घर पर उचटती सी नज़र डाल कर रसोई में जा कर एक कड़क सी चाय ले आती हूँ और आराम से अखबार पढती हूँ। मुझे राजनीती की खबरों में ज्यादा रूचि नहीं है। लेकिन अखबार में जिस पृष्ठ पर "शोक -सन्देश"छपे होतें है ,सबसे पहले वही पृष्ठ खोलती हूँ। हर शोक सन्देश को गौर से पढ़ती-देखती  हूँ फिर सोचती हूँ कि  इस के कितने बच्चे है या इसकी कितनी उम्र होगी ...कोई बेटे-पोतों वाला होता तो सोचती हूँ , "चलो अमर तो कोई भी नहीं है पर कुछ साल और जी लेता तो क्या होता।" पर कोई असमय मौत या कोई बालक होता तो मुझे लगता मैं भी उनके दुःख में शामिल हूँ और कई बार तो आँखे भी भर आती और सोचती , दुनिया में कितने दुःख है। फिर उनके परिवार-जन के लिए हिम्मत और हौसला भी माँगती जाती और अपने  आंसू पौंछती रहती  हूँ। यह  सब मैं  अपने पति शेखर से छुपा कर ही करती थी क्यूँ की उन्हें मेरी ये आदत बहुत खराब लगती थी।

    आज अखबार जैसे ही हाथ में लिया तो मुख्य -पृष्ट पर एक तस्वीर पर नज़र अटक गयी जिसके नीचे लिखा था "अरुण चौपड़ा को आई. ए.एस.की परीक्षा में पूरे भारत  में तीसरा स्थान मिला है" और तस्वीर में उसकी माँ उसे मिठाई खिलाती बहुत खुश दिख रही थी ....अरुण चौपड़ा की माँ पर मेरी नज़र अटक गयी 'अरे ये तो नीरू आंटी लग रही है 'फिर माँ को फोन लगाया और पूछा  क्या वो नीरू आंटी ही है क्या ...!माँ भी खुश थी बोली "मैं तुझे ही फोन करने वाली थी।  आज नीरू की मेहनत सफल हो ही गयी।  दोनों बेटे लायक निकले हैं। छोटा भी कुछ दिनों में इंजिनियर बन जायेगा।  अच्छा है , अब उसके भी सुख के दिन आ गए।"

   नीरू आंटी ; गोरा रंग ,भरा-भरा मुख और दुबली सी काया वाली एक भली और सीधी-सादी सी स्त्री थी। उनका ख्याल आते ही कानो में एक आवाज़ सी गूंजती है जो वह अक्सर हमें पढ़ाते वक्त , जब कोई पढ़ते वक्त कक्षा में छात्र शोर करता, अपनी तर्जनी को होठों पर रख कर जोर से बोला करती थी "श्श्श्श च्च्च्च" ...! और सारी कक्षा में शांति सी छा जाती।

यह  बात तब की बात है जब मैं सातवी में थी और नीरू आंटी 'शिक्षक-प्रशिक्षण केंद्र में पढती थी। उस केंद्र के शिक्षार्थी हमारे स्कूल में प्रेक्टिकल के तौर पर हमें पढ़ाने आया करते थे उन्ही में नीरू आंटी भी थी। वह मेरी आंटी इसलिए थी के उनके पति रमेश चौपडा और मेरे पापा एक ही महकमे में थे।वे दोनों अक्सर आया करते थे हमारे यहाँ। उनके दो बेटे थे अरुण और वरुण...! दोनों बहुत प्यारे और शरारती थे और मुझे  बच्चों से लगाव बहुत था तो उनके साथ खूब खेला करती थी।

आंटी, माँ को दीदी बुलाया करती थी। दोनों कई बार गुपचुप बात करती रहती थी। मैंने कई बार आंटी को आंसू पौंछते हुए बातें करते भी देखा तो माँ से पूछा भी तो माँ ने डांट दिया के बड़ों की बातें नहीं सुना करते।
लेकिन  तब मैं ,अपने को इंतना भी छोटा नहीं समझती थी के इंसानों के मन के भाव ना पढ़ ना पाती। मुझे रमेश अंकल की आँखों में वहशत और आंटी की आखों में एक अजीब सी दहशत नज़र आती थी। समझी बाद में , बात क्या थी आखिर !

 कई बार उनको स्कूल के बाहर भी खड़ा देखा था और जब आंटी आती तो उनको साथ में ले कर चल देते। पापा को अक्सर अपने विभाग के काम  सिलसिले से कई दिनों के लिए  बाहर जाना पड़ता। एक बार उनके साथ रमेश अंकल भी गए ...

लगभग दस दिन बाद पापा का आना हुआ। हम सब बहुत खुश थे क्यूँ कि मेरे पापा जब भी कही जाते तो हम सब के लिए कुछ ना कुछ जरुर लाते इस बार तो उदयपुर गए थे मेरे लिए वहां से चन्दन कि खुशबू वाला पेन ले कर आये तो मैं बहुत खुश थी।

 अगले दिन  स्कूल से आने के थोड़ी देर बाद नीरू आंटी लगभग रोती सी आयी और दीदी कहती हुई माँ के गले लग कर रो पड़ी। माँ ने मुझे आँखों से  ही बाहर जाने का इशारा किया। छोटे से घरों  में दीवारों के भी कान होते है और मुझे तो जानने कि उत्सुकता थी ये क्या हुआ है आज आंटी को। उनके मुहं पर काफी चोट के निशान थे।मैं भी ध्यान से सुनने लगी ...


मेरे  कानो में आंटी कि आवाज़ पड़ रही थी "दीदी आज तो हद ही हो गयी जुल्म की ;इतने दिन तक जो शक की आग लिए घूम रहे थे रमेश ,अब वो उसमे जलने भी लग गए हैं। ना जाने किस ने इनके कान भर दिए कि  जब वो उदयपुर टूर पर गए थे तो मैंने किसी से शादी कर ली , कभी किसी के साथ ,कभी किसी के साथ नाम जोड़ना तो पहले से ही आदत थी कल तो आते ही पीटना शुरू कर दिया और कहने लगे ,वो कौन है जिससे मैंने शादी की है...मैंने बहुत पूछा पर नहीं बताया कि किसने कान भरे हैं उनके ...!"

वो कई देर तक रोती रही ,माँ के यह कहने परकि क्या वो या मेरे पापा अंकल को समझाएं...!लेकिन  डर के मारे आंटी ,माँ का हाथ पकड़ते हुए बोली "नहीं दीदी फिर तो मेरा और भी बुरा हाल हो जायेगा ,शायद यही मेरी किस्मत है किसी ने सच कहा है जिसकी  बचपन में माँ मर जाती है उसका भाग्य भी रूठ ही जाता है।"और फिर से रो दी ...तब मैं, चाहे छोटी थी लेकिन  मुझे भी गलत बात का विरोध करना तो आता था .मुझे बहुत हैरानी हुई थी ,आंटी तो इतनी बड़ी है क्यूँ मार खा गयी जबकि  वह गलत भी नहीं थी ...!

उसके बाद आंटी ऐसे ही सहन करती रही फिर उनकी सरकारी स्कूल में नौकरी भी लग गयी अंकल ने भी वहीँ तबादला करवा लिया जहाँ आंटी की पोस्टिंग थी और पापा का भी तबादला दूसरी जगह हो गया और हमने भी वह  शहर छोड़ दिया .......

कई साल बीत गए ; मैं ग्यारहवी कक्षा में  आ चुकी थी। एक दिन मैं इम्तिहान की तैयारी कर रही थी सहसा दरवाजे पर दस्तक हुई तब दोपहर के लगभग दो बजे थे। दरवाज़ा खोलने पर देखा तो एक जानी पहचानी सी औरत खड़ी थी। ध्यान से देखा तो बोल पड़ी "आप नीरू आंटी ...! है ना ...!"

फिर माँ को आवाज़ दी तो वो दोनों बड़ी खुश हुई .कुछ देर बाद जब स्नेह-मिलन हो गया तो माँ ने हाल चाल पूछा  तो आंटी ने मायूसी से बताया ,"रमेश जी वैसे ही हैं, उनका शक अब लाइलाज बीमारी में  बदल गया है ;कभी खुद को ,कभी मुझे और कभी बच्चों को तो बहुत  पीटते है। एक बार तो अरुण के बाल खींच कर ही हाथ में निकाल दिए और एक बार आँख पर मारा तो बहुत बड़ा निशान हो गया , बस आँख का बचाव हो गया।
कितने ही डॉक्टर्स को दिखाया पर कोई हल नहीं। पागल-खाने में भी डाल कर देखा। उनके परिवार वाले और अब तो आस -पड़ोस के लोग भी मुझे दोषी मानते है। मैंने कितना समझाया रमेश को ,अगर मैं किसी से शादी कर ही लेती तो उसकी मार खाने को उसके साथ किसलिए रहती।लेकिन  उसके दिमाग मैं जो  शक का कीड़ा घुस गया था वो उसे और  परिवार की सुख-शान्ति और खुशियों को खाए जा रहा था। "

 माँ उनकी बातें सुन कर रो पड़ी पर आंटी की आँखे सूनी ही थी। अब कितना रोती वह भी !आंसुओं की  भी कोई सीमा या सहनशक्ति  होती होगी ,ख़त्म हो गए होंगे वे  भी अब तक। उनकी आँखों में तो बस उनके बच्चों के भविष्य की चिंता ही थी बस।

बच्चों के बारे में  पूछा तो बताया कि वे दोनों  ठीक है और पढ़ाई में भी ठीक है।  थोड़ी देर बाद आंटी चली गयी तो माँ ने उनके  बारे में बताया कि  नीरू आंटी के माँ बचपन में ही गुज़र गयी थी। उनको पड़ोस की मुहं-बोली बड़ी माँ ने पाल कर बड़ा किया था । मायके मे उनका कोई भी नहीं है और ससुराल वाले भी तभी साथ देते हैं जब  पति मान-सम्मान देता है।

"तो माँ , वो जुल्म क्यूँ सहती रही ,क्यूँ नहीं छोड़ कर चली गयी जब कि वो खुद अपने पैरों पर खड़ी थी !उनकी कोई गलती भी नहीं थी  और उनके परिवार  वालों ने अंकल को क्यूँ नहीं समझाया ...!"मैंने कुछ हैरान और दुखी हो कर माँ से पूछा।

 "अब वह  क्या करती बेचारी , अगर छोड़ कर चली जाती तो क्या दुनिया उसे जीने देती ...! उसे तो और भी कुसूरवार समझा जाता। मैंने उसे एक बार ऐसा करने को कहा भी था तो उसने मना कर दिया एक तो दुनिया की  बदनामी और इंसानियत भी उसको यह करने मना कर रही थी के अगर वो भी इसे छोड़ कर चली जाएगी तो ये तो ऐसे ही मर जायेगा चाहे मन में प्यार नहीं इसके लिए फिर भी वो उसके बच्चों का पिता तो था। उसने अपनी इसे ही किस्मत मान ली थी।" माँ ने बहुत दुखी स्वर में बताया।

मुझे सुन कर बहुत दुःख हुआ सोचने लगी कब तक औरत सक्षम होते हुए भी अपने उपर लांछन सहती रहेगी, क्यूँ नहीं हिम्मत जुटा पाती .क्यूँ गलत बात का विरोध नहीं करती.क्या विवाह किसी -किसी के लिए इतनी बड़ी सजा भी होता है ...!

 उनके मायके में कोई नहीं था तो उनके ससुराल के परिवार में तो महिलाएं थी क्या उनको भी आंटी का दर्द समझ नहीं आया ...? क्यूँ नहीं अंकल को समझाया कि आंटी गलत नहीं थी और कोई भी परिचित ,रिश्तेदार या मित्र किसी ने भी नहीं समझाया के आंटी बे-कसूर थी ...!

उसके बाद मै आंटी से नहीं मिली .बी .ए करने के बाद मेरी  शादी हो गयी और अपनी  गृहस्थी में रम गयी।फिर उड़ते -उड़ते खबर सुनी रमेश अंकल ने अपने को आग लगा कर आत्महत्या कर ली। शक की आग मे जलते रहने वाले शख्स को आग ने भी जल्दी ही पकड लिया होगा ...!

     नीरू आंटी ने पहले भी बच्चों को माँ-बाप दोनों प्यार दिया था और अंकल के जाने के बाद भी ,उनको आगे बढ़ने का हौसला दिया। यह  औरत का ही हौसला होता है जो सब कुछ सहन करके भी पर्वत की  तरह हर मुश्किल से जूझती रहती है। और आज उनकी मेहनत का  फल उनके  सामने था उनके बड़े बेटे की  कामयाबी ! उनके चेहरे से ख़ुशी झलक रही थी पर एक दर्द कि हलकी सी रेखा भी थी उनकी आँखों में।

  वह जरुर अंकल का ख्याल कर रही होगी कि  अगर आज सब-कुछ ठीक होता तो क्या ये ख़ुशी उनकी अपनी नहीं होती ....!

सोचते-सोचते ना जाने कब  मेरे भी आंसू बह चले और मैं खोयी हुई सी बैठी रही  जब तक कि शेखर ने मेरे हाथों से अखबार ना ले लिया और बोले "आज किसकी  आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना हो रही है ...!
"
"आज ये ख़ुशी के आंसू  है किसी की मेहनत या तपस्या सफल हुई है ," मैंने आंसू पोंछते हुए शेखर को तस्वीर दिखाते हुए सारी बात बताई तो उन्होंने भी अरुण की सफलता के पीछे आंटी का ही हाथ बताया और कहा "बेशक आज उनकी मेहनत सफल हुई है पर जो उनके, अपने ख़ुशी के दिन थे या जिन पर उनका हक़ था वो कौन लौटाएगा ...!
अपने दुःख की  कहीं न कहीं स्वयं नीरू आंटी भी जिम्मेदार है और दूसरे लोग जो उनको जानते थे वो भी जिम्मेदार है उन्होंने क्यूँ नहीं समझाया उनके पति को ....! बस एक जीवन यूँ ही बिता दिया उन्होंने। "
मैं भी शेखर की बातों से पूर्ण रूप से सहमत थी।  ख़ुशी और कुछ भरा मन ले कर मै उठ गयी।

---उपासना सियाग



.............................................................................................( चित्र गूगल से साभार )







Tuesday, May 21, 2013

छोटा राजकुमार और रहस्यमयी तोता ( बाल कहानी )

वीरपुर एक बहुत बड़ा राज्य था। वहां के राजा सुमेर सिंह एक कुशल प्रशाशक थे। उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की देखभाल के लिए मंत्रियों की व्यवस्था कर रखी थी। विशाल सेना थी। जिससे उनकी प्रजा को कोई दिक्कत का सामना ना करना पड़े।
जगह -जगह सरायों का निर्माण करवाया हुआ था। जिससे किसी बाहर  से आने वाले यात्री को परेशानी  का सामना न करना पड़े।
उनके राज्य में अपराधों की संख्या ना के बराबर थी , इसका मुख्य कारण था वहां पर कोई बेरोजगार नहीं था।और दूसरा  कारण था वहां की सशक्त न्याय व्यवस्था जिसके चलते अपराधियों को कड़ा  दंड मिलना।
लेकिन कुछ दिनों से राजा और उनके मंत्री बहुत परेशान  थे।
कारण...?
कारण था , राजा के आम बाग़ से , कई दिनों से आम चोरी हो रहे थे।और कोई सुराग भी नहीं मिल रहा था।राजा ने सभा बुलाई कि  क्या किया जाये...! उसके राज्य में ऐसी किसकी हिम्मत हो गयी जिसको अपनी जान की परवाह ना हो ...
राजा के चार बेटे थे ...
बड़े बेटे वीर सिंह ने कहा , " पिता जी आप चिंता ना करें , आज रात मैं निगरानी रखूँगा बाग़ की , चोर मेरी नज़रों से बच  कर नहीं जायेगा। "
राजा ने अनुमति दे दी।
राज कुमार वीर सिंह ने बाग़ में ऐसी  जगह पर अपनी बैठने की व्यवस्था कर ली जहाँ से उसे हर कोई आने-जाने वाला नज़र आता रहे।
आधी रात हो गयी।
पर ये क्या हुआ ...! अचानक यह कैसी महकी सी हवा चली। और वीर सिंह एक मदहोशी में डूब गया और पता ही नहीं चला उसे कब नींद आ गयी।  सुबह किसी ने उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे तो आँखे खुली। देखा सामने सभी लोग चिंता के मारे उसे घेरे खड़े है। रानी माँ की आँखों से तो आंसूं थम ही नहीं रहे थे।
और वीर सिंह ...?
वो तो बेहद शर्मिंदा था ,एक राज कुंवर हो कर भी एक चोर का पता नहीं लगा पाया। पर उसका कोई कुसूर भी तो ना था।
पर राजा की परेशानी तो वैसे की वैसी ही रही। इस बार मंझले राजकुमार समीर सिंह ने अपने पिता से वादा किया  के वो चोर को पकड़ेगा ...
पर उसके साथ भी वीर सिंह वाला किस्सा हुआ। इसके बाद तीसरे राजकुमार सुवीर सिंह के साथ भी यही किस्सा हुआ।
अब तो राजा बहुत फिक्रमंद हुआ कि  एक चोर को कोई भी नहीं पकड तो क्या कोई सुराग भी नहीं पा सका है।तभी सबसे छोटा राजकुमार जोरावर सिंह कहता है, " महाराज ,आज की रात मुझे  कोशिश करने दी जाये।" राजा ने समझाया भी कि  वह छोटा है। पर उसने जिद की तो राजा को मानना ही पड़ा।
आखिर राजकुमार छोटा था तो क्या हुआ ...! था तो राजसी खून ही , तो हिम्मत भी बहुत थी और समझ भी...
वह भी वही बैठ गया जहा उसके दूसरे  भाई बैठे थे।
जैसे -जैसे मध्यरात्री का समय आ रहा था , राजकुमार और  भी चौकन्ना  हो गया था कि उसे सोना नहीं है। यह बात भी सही है अगर इन्सान दृढ निश्चय कर ले तो बहुत कुछ संभव है उसके लिए।
तो उसने क्या किया ...? जिससे उसे नींद ना आये ...!
उसने अपनी एक ऊँगली को तलवार की धार पर रगड़ कर जख्मी कर लिया। जिससे पीड़ा के कारण उसे नींद ना आये।
अब समय हो आया मध्य रात्री का ...! एक महकी हुई सी हवा चलने लगी पर छोटे  राजकुमार ने तो हवा के विरुद्द रुख कर रखा था। उसने देखा बहुत सारे तोते उड़ते हुए चले आ रहे है।और सभी आम के पेड़ों पर से एक -एक आम चुरा कर भाग रहे हैं। राज कुमार ने भाग कर बड़ी मुश्किल से एक तोते को पकड लिया।
तोते को एक पिंजरे में बंद करके रख लिया गया। अगली सुबह उसे लेकर राजकुमार , राजदरबार में उपस्थित हुआ। वहां पर एक जमघट सा लगा था के एक तोता चोर कैसे हो सकता है।
अब समस्या थी कि  तोते से क्या और कैसे पूछा जाये ...!
तभी तोता मानवीय आवाज़ में बोल पड़ा , " महराज , मुझे मुक्त कर दिया जाय , मैं बेकुसूर हूँ , दूर काली पहाड़ियों पर एक महा राक्षस है हम उसी के गुलाम है। उसी ने हमें अपने माया जाल में बाँध कर यहाँ भेजा था और हमने चोरी की।"
राजा सुमेर सिंह एक दयालु व्यक्ति था। उसने तोते को मुक्त कर दिया।
लेकिन समस्या तो वहीँ की वहीँ ही रही। अब काली पहाड़ियाँ कहाँ थी , किसे मालूम , खोज के लिए किसे भेजा जाए ...! तभी बड़ा राज़  कुमार आगे हो कर अपने जाने की आज्ञा मांगने लगा। और राजा ने अनुमति भी दे डाली।क्यूँ कि वह राजा था और उसकी प्रजा उसकी संतान थी। इसलिए उसने प्रजा या अपनी सेना में से किसी को भेजने के बजाय अपने पुत्र को ही भेजना उचित समझा।
अगले दिन राजकुमार वीर सिंह घोड़े पर सवार हो कर चल दिया। कई दिन तक चलता रहा, पूछता रहा काली पहाड़ियों का पता । एक दिन उसने पाया कि सडक का रास्ता तो ख़त्म हो गया है और आगे घना  जंगल था। उसमे राह ढूंढता हुआ चल ही रहा था। उसे दूर एक बूढी औरत, जिसने  सर पर बड़ा सा लकड़ियों का गट्ठर लिया हुआ था, नज़र आई।
उसने बेरुखी से उसे पुकारा , "ए बुढ़िया ...! जंगल के पार जाने का रास्ता कौनसा है और तूने किन्ही काली पहाड़ियों के बारे सुना है क्या ...?"
पर यह भी क्या बात हुई ...!अब राजकुमार को क्या ऐसे बोलना चाहिए था ...? एक बाहुबली को एक मजबूर और लाचार  के साथ ऐसी वाणी और भाषा में तो नहीं बोलना चाहिए था।
तभी वह बूढी औरत बोल पड़ी , " पहले बेटा  मेरा ये गट्ठर तो उठा कर मेरी झोंपड़ी तक ले चलो ..."
" मुझे इतना समय नहीं है जो मैं फ़ालतू के काम करूँ ...!", राज़ कुमार उपेक्षा से कहता हुआ घोड़े को आगे की तरफ ले चल पड़ा।
बहुत मुश्किल से जंगली जानवरों से बचता कभी लड़ता आखिरकार वह जंगल से पार पहुँच ही गया। आगे विशाल नदी दिखाई पड़  रही थी। अब एक बार फिर से परेशानी में पड़  गया राज़ कुमार। अब क्या किया जाये , सोच में पड़ गया वह। फिर हिम्मत करके आस -पास नज़र दौड़ाई तो वहां एक लकड़ी का  बड़ा सा  चौकोर पटरा सा था। अपने घोड़े को वही छोड़ कर उस पर सवार हो कर नदी भी पार कर ली। आगे एक खुला मैदान आया। वहां पर उसने क्या देखा ...!
उसने देखा के वहां पर असंख्य पत्थर की मूर्तियाँ थी और वो भी इंसानों जैसी। उसे बहुत हैरानी हो रही थी कि  यहाँ वीराने में ये मूर्तियाँ कौन बनता होगा भला ...!
वह चलता रहा लेकिन तभी ....
"ओ राज़ कुमार ...!  कहाँ जा रहे हो , एक बार मुड़  कर तो देखो ...!" कोई पीछे से पुकार रहा था।
राज़ कुमार ने जैसे ही मुड़ कर देखा और वह पत्थर का बन गया।
उधर वीर पुर में सभी चिंता में डूबे  हुए थे। राजकुमार तो बहुत दिन हो गये ना खबर थी और ना ही वापस आया।इस पर राजकुमार समीर सिंह ने जाने की आज्ञा मांगी , उसका कहना था के वह चोर और अपने बड़े भाई दोनों का पता ले कर आएगा।
वह भी चल पड़ा उसने भी उस बूढी औरत की अवहेलना की और आखिरकार वह भी  पत्थर की मूर्ति में बदल गया। ऐसा ही हाल तीसरे राजकुमार का हुआ।
और अब बारी थी छोटे राजकुमार जोरावर सिंह की। पर इस बार राजा भी सहमत नहीं था और ना ही राजा के सलाहकार ... और रानी माँ का भी बुरा हाल था। वह अपने पुत्रों के वियोग में बार-बार गश खा कर गिरती रहती थी। लेकिन जोरावर सिंह अपनी बात पर अटल रहा और आखिर में उसे अनुमति मिल ही गयी।
जोरावर सिंह भी चल पड़ा। उसको भी  वही घना जंगल दिखा और वही सामने आती हुई  बूढी औरत ...!
लेकिन राजकुमार बहुत विनम्र और दयालु था। वह घोड़े से उतरा और बूढी औरत के पास जाकर बोला," माँ , लाओ ये मुझे दो , कितना बोझ है इसमें आपके कैसे उठेगा यह , मुझे बताओ , लाओ मैं इसे रख आता हूँ।"
बूढी औरत ने उसे  गट्ठर थमा  कर अपनी झोपडी की तरफ ले गई।
वहां उसने राजकुमार को पानी और थोडा गुड खाने को दिया जिससे उसके अन्दर एक शक्ति का सा संचार हुआ लगा। जब राजकुमार ने बूढी औरत से अपने भाइयों और काली पहाड़ी के बारे में पूछा तो ...
अचानक उसने क्या देखा ...!
वो बूढी औरत तो एक सुंदर से देवी में बदल गयी। उसने बताया कि  वह " वन-देवी " है। वह ऐसे ही वेश बदल कर लोगों की परीक्षा लेती  और रक्षा भी करती है। क्यूंकि जोरावर बहुत ही नेक इन्सान था इसलिए देवी ने उसकी सहायता करने का निश्चय किया।
देवी ने उसे उसे एक पतली रस्सी का बड़ा सा गोला दिया और कुछ अनाज के दानो की पोटली दी।
और  कहा, " इस गोले का एक सिरा पकड कर इसे जमीन पर छोड़ देना , यह लुढकता हुआ तुमको जंगल पार ले जायेगा। आगे एक नदी आएगी , उसमे तुम यह पोटली के दाने डालते रहना , जिससे नदी में तुम्हारे लिए राह खुद - ब - खुद ही बनता जायेगा। नदी पार कर लोगे तो तुम्हें आगे एक विशाल मैदान नज़र आएगा। उस मैदान में तुम्हें बहुत सारी पत्थर की मूर्तियाँ नज़र आएगी ,वे पत्थर की मूर्तियाँ असल में इंसान ही है। काली  पहाड़ी के राक्षस   ने उसके आसपास एक माया जाल फैला रखा है। जो भी उसके क्षेत्र में प्रवेश करता है तो उसको पीछे से कई सारी आवाजें पुकारने लग जाती है।जो भी मुड़  कर देखता है वही पत्थर हो जाता है। अब तुम यह ख्याल रखना के पीछे मुड़  कर नहीं देखना है। उसके बाद तुम अपने विवेक से काम लेते हुए आगे बढ़ना ..."
राजकुमार को आशीर्वाद दे देवी अंतर्ध्यान  हो गयी।
राजकुमार भी चल पड़ा रस्सी वाले गोले के पीछे-पीछे ...बड़ी सुगमता से जंगल पार कर लिया। अब सामने नदी थी। अपने घोड़े को वहीँ छोड़ कर दानो वाली पोटली से दाने नदी में डालता रहा और नदी भी रास्ता बनाती रही। सामने मैदान और उसमे खड़ी मूर्तियाँ देख वह समझ गया कि अब राक्षस का मायावी क्षेत्र आ गया है।
सामने ही काली पहाड़ी थी।
 राजकुमार आगे बढ़ चला।  उसको भी पुकारा जाने लगा पीछे से । एक बार तो वह ठिठक ही गया जब उसे लगा उसे उसके तीनो भाई पुकार रहें है। पर वह सावधान था ... मन तो भर आया था अपने भाइयों की पुकार पर लेकिन उसने खुद  को दृढ कर लिया था  , उसे मुड़  कर तो देखना ही नहीं है।
अब वह पहाड़ के सामने था। उस पर जाने का रास्ता तो सामने ही था। सोच ही रहा था के ...अचानक धरती में कुछ कंम्पन सा महसूस हुआ और आसमान में गर्जना सी सुनायी दी। सामने से राक्षस चला आ रहा था। राजकुमार को कुछ नहीं सुझा तो वह भाग कर एक पेड़ के पीछे की झाड़ियों में छुप  कर देखने लगा।
राक्षस बहुत विशालकाय था। बड़े- बड़े दांत , नाख़ून  और सर पर सींग और सारे शरीर पर बाल थे। पास से गुज़रा तो भयंकर बदबू  आ रही थी।
उसके जाने के बाद राजकुमार जल्दी से पहाड़ी पर चढने लगा। थोड़ी देर में की एक महल के सामने था। बाहर का दरवाज़ा खुला था। वहां  दरवाज़े पर कोई भी नहीं था और राक्षस को जरूरत भी क्या थी।उसने  अपनी माया ही ऐसी फैला रखी थी कोई उसके महल तक जा ही नहीं सकता था।
अंदर जा कर उसने देखा , बहुत सुन्दर दृश्य था वहां पर बहुत सारे  कक्ष थे हर कक्ष  की सज्जा दर्शनीय थी।लेकिन एक कक्ष के पास से गुज़रा तो उसे धीरे - धीरे रोने की आवाज़ सुनाई दी तो वह रुक गया और जहाँ से रोने की आवाज़ आ रही थी उस कक्ष की तरफ बढ़ चला। एक बार तो उसने सोचा कहीं ये भी कोई राक्षस की माया ना हो।फिर भी वह हिम्मत करके भीतर की ओर बढ़ा।
देखा एक सुंदर सी लड़की रोये जा रही थी।उसे देख कर घबरा कर खड़ी हो गयी। राजकुमार ने उसे डरने को मन करते हुए अपनी सारी कहानी  बताई।
लड़की ने बताया ,वह सुंदर नगर की राजकुमारी फूलमती  है। राक्षस ने उसके पिता से कोई शर्त लगाई थी और राजा शर्त हार गए तो उसके बदले राक्षस उसे उठा लाया। राजकुमार से हैरान हो कर वह बोली ," तुम यहाँ क्या करने आये हो राक्षस आते ही तुमको खा जायेगा।"
पर राजकुमार तो राक्षस को मार कर उसका आतंक खत्म करने आया था। वह फूलमती से महल और राक्षस का राज़  पूछने लगा।
राजकुमारी भी क्या बताती। वह तो जब आयी थी सिवाय रोने के अलावा कुछ भी नहीं किया था।उसने राजकुमारी के साथ महल में घूमना शुरू कर दिया।उन्होंने देखा सभी कक्ष खुले हैं। एक कक्ष पर छोटे -छोटे सात ताले एक क़तर में क्रमवार लगे थे, देख कर दोनों हैरान से हुए। फिर दोनों ने एक योजना बनाई।
कुछ देर बाद जब राक्षस आया तो चकित रह गया ...! राजकुमारी रो नहीं रही थी बल्कि बाहर खड़ी थी।राक्षस के पूछने पर उसने बताया कि  जब उसे वहीँ रहना है तो वह मन लगाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद वह धीरे - धीरे राक्षस से   घुलने मिलने भी लगी। एक दिन बातों ही बातों  में वह पूछ बैठी राक्षस से , " तुम कितने वीर हो और बहुत मायावी भी तो तुम्हें तो कोई मार ही नहीं सकता।"
राक्षस शरीर से बलशाली पर बुद्धि से जड़ ...!बोल पड़ा , " हाँ मुझे कोई मार नहीं सकता क्यूंकि मेरी जान तो एक तोते में बसी है ,उस तोते को मैंने मेरे बाग़ में छुपा कर रखा है। इस महल में एक कक्ष है उस  पर मैंने सात ताले लगा रखे हैं। उसमे भी सात कमरे है उसके बाद एक बाग़ है उसमे एक आम के पेड़ पर एक पिंजरे में तोता है अगर उसे कोई मार दे तो ही मैं मर सकता हूँ ...! लेकिन चाबी सदैव मेरे पास ही रहती है।"
राजकुमार छुप कर सारी  बात सुन रहा था।
अब सिर्फ चाभी ही हासिल करनी थी राजकुमार ने , मंजिल तो उसके सामने ही थी। और यह भी संयोग ही था के महीनो ना नहाने वाला राक्षस उस दिन नहाने चला गया। उसके जाते ही फूलमती ने चाबी उठा कर राजकुमार को दे दी। राक्षस को  राजकुमारी  ने बातों में उलझा लिया। और बातों ही बातों में राक्षस चाबी को भूल ही गया। महल से बाहर  भी  चला गया।
उसके जाते ही बिना मौका गवांये वे दोनों बंद कक्ष के सामने थे। एक -एक कर के ताले खोलने लगे। सातवे ताले को खोल ही रहे थे के राक्षस महल में आ पहुंचा। राक्षस को थोड़ी दूर जाते ही चाबी की याद आ गयी थी।अब एक तरफ तो राक्षस आगे की और बढ़ रहा था।दूसरी तरफ वे दोनों ताला खोल चुके थे। और भागते हुए आगे जो क्रमवार कमरे बने थे उनके दरवाज़े धकेल कर खोलते हुए आगे भागते हुए जा रहे थे।
राक्षस के क्रोध की पारावार ही नहीं थी। उसके क़दमों से धरती और हुंकार से आकाश भी काँप  रहा था।वो बढ़ा चला जा रहा था।
तब तक वे दोनों बाग़ में पहुँच चुके थे। अब तलाश थी उनको तोते की ...! उस आम के पेड़ की जिस पर तोता था ...!
तभी सामने उनको पिंजरे में तोता दिख गया।
" नहीं ...!" राक्षस जोर से दहाडा।
" उसे हाथ मत लगाना ...!"राक्षस फिर दहाडा ...
लेकिन राजकुमार ने तोते को हाथ में ले लिया था और उसने तोते की एक टांग मरोड़ दी।
राक्षस एक टांग से लंगड़ा हो गया। फिर तोते की दूसरी टांग मरोड़ी और राक्षस नीचे गिर पड़ा लेकिन हाथों के सहारे रेंगता आगे बढ़ गया।
राजकुमार ने तोते का एक पंख मरोड़ दिया तो राक्षस का एक हाथ टूट गया। दूसरा पंख मरोड़ा तो दूसरा हाथ टूट गया।
और आखिर में तोते की गर्दन मरोड़ी तो राक्षस निढाल हो कर गिरा और मर गया।
उसके मरते ही उसका माया जाल भी खत्म हो गया। बाग़ के पेड़ों पर बैठे  सभी तोते उड़ गए उन्मुक्त हो कर आसमान में।
काली पहाड़ी भी अपने असली स्वरूप में आ कर  अपनी सुनहरी आभा से चमक रही थी।
जितने भी लोग मूर्तियों में बदले हुए थे वे सभी  फिर से इन्सान बन गए थे। राजकुमार अपने भाइयों से मिल कर बहुत ही खुश हुआ। जोरावर सिंह ने अपने भाइयों को  राजकुमारी का परिचय दिया और बताया अगर फूलमती  का सहयोग नहीं मिलता तो  राक्षस का मारा जाना संभव नहीं था।
फिर सभी वीर पुर की ओर चल पड़े। वहां पर सभी का बहुत भव्य स्वागत हुआ। राजकुमारी फूलमती के पिता राजा सुंदर सेन को भी बुलाया गया और राज़ कुमारी को उनके साथ विदा कर दिया।
इसके बाद वहां पर कोई भी अपराध नहीं हुआ सभी  सुख -चैन के साथ रहे।

उपासना सियाग







Saturday, May 11, 2013

मेरी माँ , प्यारी माँ , मम्मा ..


माँ की ममता को कौन नहीं जानता और कोई परिभाषित भी नहीं कर पाया है। सभी को माँ प्यारी लगती है और हर माँ को अपना बच्चा प्रिय होता है। मेरी माँ भी हम चारों बहनों को एक सामान प्यार करती है। कोई भी यह नहीं कहती कि माँ को कौनसी बहन ज्यादा प्यारी लगती है, ऐसा लगता है जैसे उसे ही ज्यादा प्यार करती है। लेकिन मुझे लगता है मैंने मेरी माँ को बहुत सताया है क्यूंकि मैं बचपन में बहुत अधिक शरारती थी।
     मेरा जन्म हुआ तो मैं सामान्य बच्चों की तरह नहीं थी। मेरा एक पैर घुटने से भीतर की और मुड़ा  हुआ था।नानी परेशान थी पर माँ ...! वह तो गोद में लिए बस भाव विभोर थी।
नानी रो ही पड़ी थी , " एक तो दूसरी बार लड़की का जन्म ,उस पर पैर भी मुड़ा  हुआ कौन  इससे शादी करेगा कैसे जिन्दगी कटेगी इसकी ...! "
   माँ बोली , " माँ तुम एक बार इसकी आँखे तो देखो कितनी प्यारी है ..., तुम चिंता मत करो ईश्वर सब अच्छा करेगा। "
  मेरी माँ में सकारात्मकता कूट-कूट कर भरी है , तभी तो हम चारों बहनों में भी यही गुण है। किसी भी परिस्थिति में डगमगाते नहीं है हम।
  खैर , मुड़ा हुआ पैर तो ठीक करवाना ही था। पहले सीधा कर के ऐसे ही कपडे से बाँध कर रखा गया। बाद में पैर को सीधा करने के लिए प्लास्टर किया गया जो की तीन महीने रखा गया।( अब तो माँ को भी याद नहीं है कि कौनसा पैर मुड़ा हुआ था।) तब तक मैं सरक कर चलने की कोशिश करने लगी थी।माँ बताया करती है कि मुझे पानी में भीगने का बहुत शौक था। माँ के इधर -उधर होते ही सीधे पानी के पास जा कर बैठ जाती , जिसके फलस्वरूप पानी पलास्टर के अंदर  चला जाता। अब उसके अंदर से तो पोंछा नहीं जा  सकता था। पानी की अंदर ही अन्दर बदबू होने लगी। रात की माँ के साथ ही सोती थी और सर्दियों में , रजाई में भयंकर बदबू असहनीय थी। लेकिन माँ ने वह भी ख़ुशी -ख़ुशी झेल लिया। माँ की ममता का कोई मोल नहीं चुका सकता है लेकिन मेरी माँ ने तो जो बदबू सहन की उसका मोल मैं कैसे उतारूँ , मेरे पास कोई जवाब नहीं है। मैंने अनजाने में ही बहुत तकलीफ दी है माँ को ...!
    जब बहुत छोटी थी तभी से मुझे भीड़ से बहुत डर  लगता था। माँ जब भी बस से सफर करती तो मैं भीड़ से डर  के माँ के  बाल अपनी दोनों मुट्ठियों में जकड़ लेती थी और घर आने तक नहीं छोडती थी। अब सोचती हूँ माँ को कितनी पीड़ा होती होगी। इस दर्द का कोई मोल है क्या ...?
  मेरी सारी शरारतें - बदमाशियां माँ हंस कर माफ़ कर देती। जबकि मैं अपनी छोटी बहन पूजा को बहुत सताया करती थी। खास तोर से चौपड़ के खेल मे तो जरुर ही पूजा रो कर -हार ही खड़ी होती थी।
  पढाई में हमेशा से अच्छी रहीं है हम चारों बहने , मुझे याद है जब मैं आठवी कक्षा में प्रथम आयी थी तो माँ ने गले लगा कर कितना प्यार किया था। और नवीं कक्षा में विज्ञानं मेले के दौरान मेरा माडल जिला स्तर पर प्रथम आया था और पापा ने जाने नहीं दिया था आगे की प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए  ,तो माँ ने समझाया था कि  मैं ना सही मेरा मोडल तो वहां गया ही है ना , नाम तो तुम्हारा ही होगा। माँ कभी उदास या रोने तो कभी देती ही नहीं है ।
जब हॉस्टल गयी तो माँ रो पड़ी थी कि अब घर ही सुना हो जायेगा क्यूंकि मैं ही थी जो कि घर में बहुत बोलती थी या सारा दिन रेडिओ सुना करती थी।  और नहीं तो बहनों से शरारतें ही करती रहती थी। जब घर आती तो छोटी बहन शिकायत करती थी कि जब से मैं हॉस्टल गयी हूँ तब से माँ कोई भी खाने की वह चीज़ ही नहीं बनाती थी जो मुझे पसंद थीऔर बनती भी तो वह खाती नहीं थी । माँ झट से कह देती कि यह तो मुझे बहुत पसंद है , माँ के तो गले से ही नहीं उतरेगी बल्कि बनाते हुए भी जी दुखेगा। अब मुझे खाने का भी बहुत शौक था तो अधिकतर चीज़ें मुझे पसंद ही होती थी। मुझे कोई ज्यादा महसूस नहीं होता था सिवाय इसके की यह माँ का प्यार है।
 जब बच्चे का भविष्य बनाना हो तो माँ थोड़ी सी सख्त भी हो जाती है। मेरा मन भी हॉस्टल में नहीं लगा , एक महीने तक रोती  ही रही कि मुझे घर ही जाना है यहाँ नहीं रहना। पापा को भी कई बार बुलवा लिया कि मुझे वहां से ले जाओ लेकिन माँ ने सख्त ताकीद की कि यदि वह घर आने की जिद करे तो बाप-बेटी को घर में आने की इजाज़त नहीं है। पापा ने भी मज़ाक किया कि मैं तो हॉस्टल में रह लूंगी लेकिन वे कहाँ जायेंगे इसलिए वो मुझे घर नहीं ले जा सकते।
   लेकिन अब जब मैं खुद माँ हूँ और मेरे दोनों बेटे हॉस्टल में हैं तो मैं माँ होने का दर्द समझ सकती हूँ। माँ का दर्द माँ बनने के बाद ही जाना जा सकता है। लेकिन फिर भी माँ क़र्ज़ तो कोई भी नहीं उतार पाया है। माँ बन जाने के बाद भी।
मैं चाहती हूँ कि माँ हमेशा स्वस्थ रहे और उनका आशीर्वाद और साया हमेशा हमारे साथ रहे।



Thursday, May 2, 2013

नसीब ..

   कॉलेज में छुट्टी की घंटी बजते ही अलका की नज़र घड़ी पर पड़ी। उसने भी अपने कागज़ फ़ाइल में समेट , अपना मेज़ व्यवस्थित कर कुर्सी से उठने को ही थी कि जानकी बाई अंदर आ कर बोली , " प्रिंसिपल मेडम जी , कोई महिला आपसे मिलने आयी है।"
" नहीं जानकी बाई , अब मैं किसी से नहीं मिलूंगी , बहुत थक गयी हूँ ...उनसे बोलो कल आकर मिल लेगी।"
" मैंने कहा था कि अब मेडम जी की छुट्टी का समय हो गया है , लेकिन वो मानी नहीं कहा रही है के जरुरी काम है।" जानकी बाई ने कहा।
" अच्छा ठीक है , भेज दो उसको और तुम जरा यहीं ठहरना ....," अलका ने कहा।
    अलका  भोपाल के गर्ल्स कॉलेज में बहुत सालों से प्रिंसिपल है। व्यवसायी पति का राजनेताओं में अच्छा रसूख है। जब भी उसका  तबादला  हुआ तो रद्द करवा दिया गया। ऐसे में वह घर और नौकरी दोनों में अच्छा तालमेल बैठा पायी।नौकरी की जरूरत तो नहीं थी उसे लेकिन यह उनकी सास की आखिरी इच्छा थी कि  वह शिक्षिका बने और मजबूर और जरूरत मंद  महिलाओं की मदद कर सके।
       उसकी सास का मानना था कि अगर महिलाये अपनी आपसी इर्ष्या भूल कर किसी मजबूर महिला की मदद करे तो महिलाओं पर जुल्म जरुर खत्म हो जायेगा। वे कहती थी अगर कोई महिला सक्षम है तो उसे कमजोर महिला के उत्थान के लिए जरुर कुछ करना चाहिए।
      जब वे बोलती थी तो अलका उनका मुख मंडल पर तेज़ देख दंग  रह जाती थी। एक महिला जिसे मात्र  अक्षर ज्ञान ही था और इतना ज्ञान !
       पढाई पूरी  हुए बिन ही अलका की शादी कर दी गयी तो उसकी सास ने आगे की पढाई करवाई। दमे की समस्या से ग्रसित उसकी सास ज्यादा दिन जी नहीं पाई।  मरने से पहले अलका से वचन जरुर लिया कि वह शिक्षिका बन कर मजबूर औरतों का सहारा जरुर बनेगी। अलका ने अपना वादा निभाया भी।अपने कार्यकाल में बहुत सी लड़कियों और औरतों का सहारा भी बनी।अब रिटायर होने में एक साल के करीब रह गया है।कभी सोचती है रिटायर होने के बाद वह क्या करेगी ....!
" राम -राम मेडम जी ...!" आवाज़ से अलका की तन्द्रा  भंग हुई।
सामने उसकी ही हम उम्र लेकिन बेहद खूबसूरत महिला खड़ी थी। बदन पर साधारण - सूती सी साड़ी थी। चेहरे पर मुस्कान और भी सुन्दर बना रही थी उसे।
" राम -राम मेडम जी , मैं रामबती हूँ। मैं यहाँ भोपाल में ही रहती हूँ। आपसे कुछ बात करनी थी इसलिए चली आयी।  मुझे पता है यह छुट्टी का समय है पर मैं क्या करती मुझे अभी ही समय मिल पाया।" रामबती की आवाज़ में थोडा संकोच तो था पर चेहरे पर आत्मविश्वास भी था।
" कोई बात नहीं रामबती , तुम सामने बैठो ...!" कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए अलका ने उसे बैठने का इशारा किया।
" अच्छा बताओ क्या काम है और तुम क्या करती हो ...?" अलका ने उसकी और देखते हुए कहा।
रामबती ने अलका की और गहरी नज़र से देखते हुए कहा , " मेडम जी  , मैं वैश्या हूँ ...! आप मेरे बारे में जो चाहे सोच सकते हो और यह भी  के मैं एक गिरी हुयी औरत हूँ।"
" हां गिरी हुई  तो हो तुम ...!" अलका ने होठ भींच कर कुछ आहत स्वर में रामबती को देखते हुए कहा।
" लेकिन तुम खुद  गिरी हो या गिराया गया है यह तो तुम बताओ। तुमने यही घिनोना पेशा  क्यूँ अपनाया।काम तो बहुत सारे है जहान में।अब मुझसे क्या काम आ पड़ा तुम्हें। " थोडा सा खीझ गयी अलका।
एक तो थकान  और  दूसरे भूख भी लग आयी थी उसे। उसने जानकी बाई को दो कप चाय और बिस्किट लाने को कहा।
" पहले मेडम जी मेरे बारे में सुन तो लो ...! साधारण परिवार में मेरा जन्म हुआ।पिता चपरासी थे।माँ-बाबा की लाडली थी। मेरी माँ तो रामी ही कहा करती थी मुझे। हम तीन बहने दो भाई ,परिवार भी बड़ा था।फिर भी पिता जी ने हमको स्कूल भेजा।"
       "मेरी ख़ूबसूरती ही मेरे जीवन का बहुत बड़ा अभिशाप बन गयी। आठवीं कक्षा तक तो ठीक रहा लेकिन उसके बाद ,मेडम जी.… !  गरीब की बेटी जवान भी जल्दी हो जाती है और उस पर सुन्दरता तो ' कोढ़ में खाज ' का काम करती है।  मेरे साथ भी यही हुआ।" थोडा सांस लेते हुए बोली रामबती।
  इतने में चाय भी आ गयी।  अलका ने कप और बिस्किट उसकी और बढ़ाते हुए कहा , " अच्छा फिर ...!"
    " अब सुन्दर थी और गरीब की बेटी भी जो भी नज़र डालता गन्दी ही डालता।स्कूल जाती तो चार लड़के साथ चलते , आती तो चार साथ होते। कोई सीटी मारता कोई पास से गन्दी बात करता या कोई अश्लील गीत सुनाता निकल जाता। मैं भी क्या करती। घर में शिकायत की तो बाबा ने स्कूल छुडवा दिया।"
    " कोई साल - छह महीने बाद शादी भी कर दी। अब चपरासी पिता अपना दामाद चपरासी के कम क्या ढूंढता सो मेरा पति भी एक बहुत बड़े ऑफिस में चपरासी था। मेरे माँ-बाबा तो मेरे बोझ से मुक्त हो गए कि  उन्होंने लड़की को ससुराल भेज दिया अब चाहे कैसे भी रखे अगले ,ये बेटी की किस्मत ...! मैं तो हर बात से नासमझ थी। पति का प्यार -सुख क्या होता है नहीं जानती थी।बस इतना जानती थी कि पति अपनी पत्नी का बहुत ख्याल रखता है जैसे मेरे बाबा मेरी माँ का रखते थे।कभी जोर से बोले हुए तो सुना ही नहीं। पर यहाँ तो मेरा पति जो मुझसे 10 साल तो बड़ा होगा ही , पहली रात को ही मेरे चेहरे को दोनों हाथों में भर कर बोला ...!" बोलते -बोलते रामबती थोडा रुक गयी। चेहरे से लग रहा था जैसे कई कडवे घूंट पी रही हो।
   चेहरे के भाव सयंत कर बोली , " मेडम जी , कितने साल हो गए शादी को मेरी उम्र क्या है मुझे नहीं याद !लेकिन मेरे पति ने जो शब्द मुझे कहे वह मेरे सीने में वे आज भी ताज़ा घाव की तरह टीस मारते हैं।वो बोला ,' तू तो बहुत सुन्दर है री ...! बता तेरे कितने लोगों से सम्बन्ध रहे हैं। ' मुझे क्या मालूम ये सम्बन्ध क्या चीज़ होती है भला ...! मैं बोली नहीं चुप रही।"  
    " सुन्दर पति का दिल इतना घिनोना भी होगा मुझे बाद में मालूम हुआ। पति ने नहीं कद्र की  तो बाकी घर वालों नज़र में भी मेरी  कोई इज्ज़त नहीं थी। कभी रो ली। कभी पिट ली। यही जिन्दगी थी मेरी। माँ को कहा तो मेरा नसीब बता कर चुप करवा दिया। शादी के बाद जब पहला करवा चौथ आया तो सब तैयारी कर रहे थे। मैंने साफ़ मनाही कर दी के मुझे यह व्रत नहीं करना।  मुझे अपने आप और उपर वाले से झूठ बोलना पसंद नहीं आया। "
  " सास ने बहुत भला - बुरा कहा , गालियां भी दी मेरे खानदान को भी कोसा। लेकिन मैंने भी अम्मा को साफ़ कह दिया के मैं उसके बेटे जैसा पति अगले जन्म तो क्या इस जन्म में भी नहीं चाहूंगी। मेरी मजबूरी है जो  मैं यहाँ रह रही हूँ।यह मेरी पहली बगावत थी। "
   " शक्की , शराबी और भी बहुत सारे अवगुणों की खान मेरा पति राम किशन और मैं रामबती ....!ज़िन्दगी यूँ ही कट रही थी। "
   " मेडम जी ...! मुझे तो सोच कर ही  हंसी आती कि उसके नाम में भगवान राम और किशन दोनों और दोनों ही उसके मन में नहीं ...! लेकिन नाम से क्या भगवान् बन जाता है क्या ...?"
    ऐसे में सलीम मेरे जीवन में ठंडी हवा का झोंका बन कर आया। सलीम मेरे पडोसी का लड़का था और मेरा हम उम्र था। सुना था आवारा था पर मुझे उसकी बातें बहुत सुकून पहुंचाती थी। पहले सहानुभूति फिर प्यार दोनों से मैं बहक गयी और क्यूँ न बहकती आखिर मैं भी इन्सान थी।
    उसके इश्क में एक दिन घर छोड़ दिया मैंने और कोठे पर बेच दी गयी। एक नरक से निकली दूसरे नरक में पहुँच गयी। यहाँ तो वही बात हुई  न मेडम जी , आसमान से गिरे और खजूर में अटके। मैंने  कोशिश भी बहुत की वहां से निकलने की लेकिन नहीं जा पाई और फिर मेरा जीवन रेल की पटरियों जैसे हो गया कितने रेलगाड़ियाँ गुजरी यह पटरियों को कहाँ मालूम होता है और कौन उनका दर्द समझता है ...!" शायद यही मेरा नसीब था। " कहते - कहते रामबती की आँखे भर आयी।
    अलका जैसे उसका दर्द समझते -महसूस करते कहीं खो गयी और जब उसने नसीब वाली बात कही तो उसे अपने विचार पर थोडा विरोधाभास सा हुआ। हमेशा कर्म को प्रधानता देने वाली अलका आज विचार में पड़ गयी कि  नसीब भी कोई चीज़ होती है शायद ...! क्यूँ की उसे तो हमेशा जिन्दगी ने दिया ही दिया है। जन्म से लेकर अब तक जहाँ पैर रखती गयी जैसे ' रेड- कार्पेट ' खुद ही बिछ गए हों।तो क्या ये अलका का नसीब था तो फिर का कर्म क्या हुआ ...! सोच में उलझने लगी थी वह।
  तभी फॊन टुनटुना उठा।  अलका ने देखा उसकी बहू  थी फोन पर ,कह रही थी  खाने पर इंतजार हो रहा है उसका ।अलका ने देर से आने को कह मना कर दिया कि वह खाना नहीं खाएगी। फिर रामबती से कहने लगी कि वह अब उसके लिए क्या कर सकती है।
"वही तो बता रही हूँ  मेडम जी , आप के सामने मन हल्का करने को जी चाहा तो अपनी कहानी सुनाने बैठ गयी। " रामबती ने बात को आगे बढ़ते हुए कहा।
" मैंने उस नर्क को ही अपना नसीब ही समझ लिया और अपना दीन -ईमान सब भूल बैठी। दुनिया और उपर वाले से जैसे एक बदला लेना हो मुझे , मैंने किसी पर दया रहम नहीं की ,जब तक मेरा रूप-सौन्दर्य था तब तक मैंने और बाद में मैंने और भी लड़कियों को इस काम में घसीटा।
    लेकिन मेडम जी , मुझे मर्द -जात की यह बात कभी भी समझ नहीं आयी , खुद की पत्नियों को तो छुपा -लुका  कर रखते है। किसी की नज़र भी ना पड़े।  शादी के पहले भी पाक -साफ बीबी की चाह  होती है और बाद में भी कोई हाथ लगा ले तो जूठी हो जाती है ...! तो फिर वह हमारे कोठे या और कहीं क्यूँ 'जूठे भांडो' में मुहं मारता  है .... कुत्तों की तरह ...!हुहँ ..छि ...!! " मुहं से गाली निकलते -निकलते रह गयी रामबती के मुहं से।
   " पिछले एक सप्ताह से मैं सो नहीं पायी हूँ।  मुझे लगा एक बार रामबती खुद रामबती के सामने ला कर खड़ी कर दी गयी हो। एक लड़की जिसे दलाल मेरे सामने लाया। शायद वह भी किसी के प्यार के बहकावे में फांस  कर मेरे पास लाई गयी हो।  डर के मारे काँप रही थी। मुझे पहली बार दया आयी उस पर और उससे पूछा तो उसने बताया कि  वह अनाथ है।  कोई भी नहीं है उसका।  अनाथालय से ही वह बाहरवीं कक्षा में पढाई कर रही थी। सलोनी नाम है उसका।"
   " मैं चाहती हूँ के आप उसके लिए कुछ कीजिये। यही मेरे पाप का प्रायश्चित होगा।" रामबती ने अपनी बात खत्म की।
" रामबती तुम्हारा ख्याल बहुत अच्छा है। मैं सोच कर बताती हूँ कि  मैं उसके लिए क्या कर सकती हूँ। अब तुम जाओ और कल शाम को उसे मेरे यहाँ ले आओ फिर उससे बात करके तय करेंगे कि  वह क्या चाहती है। "      अलका ने भी बात खत्म करते हुए खड़े होने का उपक्रम किया।
रामबती भी चली गयी। अलका कॉलेज से घर  पहुँचने तक विचार मग्न ही रही। मन में कई विचार आ-जा रहे थे।घर पहुँचते ही दोनों बच्चे यानि उसके पोते-पोती उसी का इंतजार कर रहे थे। दोनों को गले लगा कर जैसे उसकी थकन ही मिट गयी हो।
    रात को खाने के मेज़ पर उसने सबके सामने रामबती और सलोनी की बात रखी। अलका के पति निखिल ने कहा कि अगर वह लड़की आगे पढना चाहे तो उसे आगे पढाया जाये। वह  उसका खर्चा उठाने को तैयार है। ऐसा ही कुछ विचार अलका के मन में भी था। बेटे-बहू  की राय थी कि  पहले सलोनी की राय ली जाये। हो सकता वह कोई काम सीखना चाहे।
    अगली सुबह रविवार की थी। सारे सप्ताह की भाग दौड़ से निजात का दिन है रविवार अलका के लिए।हल्की गुलाबी धूप में बैठी अलका कल वाली बात सोच रही थी। उसे रामबती की बातों ने प्रभावित किया था खास तौर पर पुरुषों की जात पर जो सवाल किया।  वह तो उसने भी कई बार अपने आप से किया था और जवाब नहीं मिला कभी।
     हाथ में चश्मा पकडे हलके-हलके हाथ पर थपथपा रही थी। उसे पता ही नहीं चला निखिल कब सामने आ कर बैठ गए । कुर्सी के थपथपाने पर उसकी तन्द्रा  भंग हुई। उसने निखिल से भी यही सवाल दाग दिया ।
    निखिल ने कहा , " पुराने समय से ही औरत को सिर्फ देह ही समझा गया है और पुरुष की निजी सम्पति भी ...! जो सिर्फ भोग के लिए ही थी। तभी तो हम देख सकते है कि राजाओं की कई-कई रानियाँ हुआ करती थी।वे जब युद्ध जीता करते थे तो उनकी रानियों से भी दुष्कर्म करना अपनी जीत की निशानी माना  करते थे।अब भी  पुरुष की यही प्रवृत्ति है।  वह अब भी उसे अपनी संपत्ति मानता है। और दूसरी स्त्रियों को भोग का साधन ...! इसिलिए वह अपने घर की औरतों को दबा -ढक कर रखना चाहता है। लेकिन औरतों की इस स्थिति का जिम्मेवार मैं खुद औरतों को  मानता हूँ ...! क्यूँ वह पुरुष को धुरी मानती है ? क्यूँ नहीं वह अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व रचती ? क्यूँ वह खुद को पुरुष की नज़रों में ऊँचा उठाने की हौड़  में अपने ही स्वरूप को नीचा दिखाती है ...! मेरा पति , मेरा बेटा  या कोई भी और रिश्ता क्यूँ ना हो ,  झुकती चली जाती है। फिर पुरुष क्यूँ ना फायदा उठाये , यह तो उसकी प्रवृत्ति है ...!"
   अलका को काफी हद तक उसके बातों में सच्चाई नज़र आ रही थी।कुछ कहती तभी सामने से सलोनी और रामबती आती दिखी।
    सलोनी का सुन्दर मुख कुम्हलाया हुआ और भयभीत था।अलका ने प्यार से सर पर हाथ फिर कर गले से लगा लिया उसे। जैसे कोई सहमी हिरनी जंगल से निकल कर भेड़ियों  रूपी इंसानों में आ गयी हो। सलोनी  आशंकित नज़रों से अलका की तरफ ताक रही थी। अलका ने उसे आश्वस्त किया कि वह अब सुरक्षित है।उससे उसकी पिछली जिन्दगी का पूछा और आगे क्या करना चाहती है। सलोनी की पढने की इच्छा बताने पर निखिल ने अपना खर्च वहन करने का प्रस्ताव रखा।
 इसके लिए रामबती ने मना  कर दिया और कहा , " मैंने पाप -कर्म से बहुत पैसा कमाया है। अब इसे अगर सही दिशा में लगाउंगी तो शायद मेरा यह जीवन सुधर जाये।  अगले जन्म में अच्छा नसीब ले कर पैदा हो जाऊं।सलोनी का नसीब अच्छा है तभी तो आपका साथ मिल गया , यह बहुत बड़ा अहसान है हम पर आपका मेडम जी -साहब जी ...!"
    एक बार अलका फिर से उलझ गयी कर्म और नसीब में।
 उसने रामबती से कहा , " माना कि नसीब में क्या है और क्या नहीं , कोई नहीं जानता है। लेकिन जो मिला है
उसे ही नसीब मान लेना कहाँ की समझदारी है। कठिन पुरुषार्थ से नसीब भी बदले जा सकते है।
'हाथ लगते ही मिट्टी  सोना बन जाये यह नसीब की बात हो सकती है लेकिन जो मिट्टी को अपने पुरुषार्थ से सोने  में बदल दे और अपना खुद ही नसीब बना  ले ' ऐसा भी तो हो सकता है। तुम ऐसा क्यूँ सोचती हो ये नारकीय जीवन ही तुम्हारा नसीब बन कर रह गया है। तुम अब भी यह जीवन छोड़ कर अच्छा और सम्मानीय जीवन बिता सकती हो। तुम अगर चाहो तो मैं बहुत सारी  ऐसी संस्थाओं को जानती हूँ जो तुम्हारे बेहतर जीवन के लिए कुछ कर सकती है। तुम्हारे साथ और कितनी महिलाये है ? "
" मेडम जी , क्या सच में ऐसा हो सकता है ? मेरे साथ मुझे मिला कर छह औरतें है। सच कहूँ तो बहुत तंग आ चुके है ऐसे जीवन से ...! क्या हमारा भी नसीब बदलेगा ...!" आँखे और गला दोनों भर आये रामबती के।
" यह इंसान पर निर्भर करता है कि  वह अपने लिए कैसी जिन्दगी चुनता है। ईश्वर अगर नसीब देता है तो विवेक भी देता है। इसलिए हर बात नसीब पर टाल  कर उस उपर बैठे ईश्वर को बात -बात पर अपराध बोध में मत डालो। " अलका ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा।
रामबती ने भी अपना नसीब बदलने की ठान ली और अलका का शुक्रिया कहते हुए सामजिक संस्थाओ में बात  करने को कह सलोनी को लेकर चल पड़ी।

उपासना सियाग
अबोहर ( पंजाब )






Thursday, April 25, 2013

मेरी प्यारी पंडिताइन सावित्री ......

     आज सुबह उठी तो मन भारी  था और आशंकित सा भी था। एक सपना जिसमे एक समारोह में , मैं मिठाई खा रही हूँ। सपने के बारे में सोचा ,हंसी आयी पहले तो , वह इसलिए की आज -कल डाक्टर ने सब कुछ खाना -पीना ( सिवाय हरी सब्जी के )बंद करवा रखा है तो मिठाई के सपने आ रहे हैं।फिर ध्यान आया , ऐसे सपने तो अशुभ होते है आज जरुर कोई अनहोनी खबर ही आएगी।
     घर के काम में व्यस्त थी कि  बाहर  माँ के किसी के साथ बोलने की आवाज़ सुनाई दी जो कि नज़दीक आती गयी। मुड़  कर देखा तो माँ के साथ पंडिताइन खड़ी थी , लेकिन वो नहीं थी जो हमेशा होती है यह तो दूसरी वाली थी जो ऐसे ही अक्सर चक्कर लगाने आ जाती है वार -त्यौहार पर। माँ उसे बाहर से बुला कर लाई यह कह कर की आज से वह रसोई ले कर जाएगी। मैं हैरान होकर माँ को देख रही थी कि माँ ने कहा कि  सावित्री नहीं रही , 6 -7  दिन हो गए। मुझे बहुत हैरानी हुई  ऐसे कैसे नहीं रही , बुजुर्ग थी पर जाने वाली तो नहीं थी। फिर मुझे सपने का ख्याल आया कि  यही अनहोनी खबर मिलनी थी क्या आज ...!
     सावित्री मेरे घर  सूखी रसोई लेने आती थी। चार फुट की छोटी सी , दुबली पतली सावित्री , घर-घर जा कर रसोई लेने जाया करती थी । वैसे नियम के हिसाब से तो रसोई लेने का हक़ सिर्फ कर्मकांडी पंडित या पुजारी को ही होता है लेकिन वह बहुत मजबूर थी कमाने वाला भी कोई नहीं था।इसलिए उसे कोई लौटाता नहीं था।
     लगभग 18 साल पहले हम अबोहर में रहने आये तो सब कुछ व्यवस्थित करने के बाद मुझे एक पंडिताइन की तलाश हुई  जो घर आकर महीने में चार बार आकर ( दो द्वादशी , पूर्णिमा और अमावस्या ) रसोई ले जाये।हालाँकि घर के पास ही मंदिर भी था। लेकिन घर से ले जाने वाली बात ही और थी।पड़ोसन ने एक पंडिताइन बता दी। वह नियम से आती और चुप-चाप अपनी रसोई ले जाती।
     एक दिन दरवाज़े की घंटी बोली तो एक छोटे से कद की औरत सर पर लोहे की बड़ी सी परात ले कर खड़ी थी उसमे कई सारे लिफाफे थे अलग - अलग आकर और रंग के। कहने लगी कि वह ब्राह्मणी है और उसे ही रसोई दिया करे।मैंने उसे अंदर बुला तो लिया लेकिन कहा कि मेरे तो पहले से ही एक ब्राह्मणी  आती है। अब सब को दान देने लगी तो चौधरी -साहब मुझे भी तुम्हारे साथ ही भेज देंगे।
    घर आयी ब्राह्मणी को खाली कैसे भेज देती।उसे भी कुछ न कुछ दे कर विदा किया।उसके बाद तो जैसे दोनों में जैसे होड़ सी मच गयी हो। सावित्री अक्सर बाज़ी मार लेती और मुझे दोनों को ही रसोई डालनी पड़ती। आखिर मैंने हार कर पहले वाली को आने मना कर दिया क्यूँ कि  सावित्री सच में मजबूर थी और उसे सहायता की जरूरत थी। उसके अनुसार उस पर उसके दो बेटों का बोझ है और तीन विवाहित बेटियां है जिनके की 9 बेटियां है सभी का पालन उसकी कमाई से ही होगा। उसकी कमाई सिर्फ यह रसोई ही थी। बड़ा बेटा मजदूरी करता था कभी जाता तो कभी बेकार भी रहना पड़ता।
    वह जब आती तो यह भी बताती की कौनसा व्रत कब है कौनसी तिथि कब है ...! या जब मैं पूछती के फलां व्रत कब है या अमुक तिथि कब है तो वह गड़बड़ा जाती और कहती कि वह पंडित जी से पूछ कर बताएगी। हालांकि मेरे पास मेरा अपना पंचांग होता है और मैं खुद अपने परिवार वालों को बताती रहती हूँ की कौनसा व्रत कब आएगा। संजय जी कभी - कभी खीझ उठते हैं और कह बैठते हैं कि  वह एक जाटनी को ही ब्याह कर लाये थे। यह पंडिताइन कैसे बन गई।मेरे पास उनकी बात सुन कर हंस कर टालने के सिवा कुछ भी कहने को नहीं होता।
     एक बार जब मैंने व्रत का उद्यापन करना था तो मैंने सावित्री से कहा , " दादी , आप और पंडित जी कल खाना खाने आ जाना।"
वह बोली कि वह और उसका बेटा  आयेंगे खाने के लिए। मैं हैरान रह गई मुझे पति-पत्नी को खाना खिलाना था माँ-बेटा कैसे खा सकते थे।तब उसने बताया के पंडित जी तो जाने कब के उसे छोड़ चुके हैं। उससे अलग ही रहते हैं। उसने अकेले ही अपने बच्चों को पाला  और शादियाँ की हैं।

    उसे गौर से देखा तो सुहागिनों वाले सारे श्रृंगार सजा रखे थे उसने। मेरे देखने पर वह बोली , "बिटिया पति का नाम ही बहुत बड़ी आगल ( मुख्य दरवाजे पर लगने वाली डंडे नुमा कुण्डी ) होती है एक औरत के लिए । उसे पार कर कोई भीतर नहीं आ सकता। "मैंने उसे कुछ नहीं कहा पर मेरा मन भीग गया अंदर तक।
     संजय जी को उससे वैसे ही चिढ़ थी और उसके आने का समय भी कुछ ऐसा कि एक तरफ संजय जी खाना खाने बैठते और दूसरी तरफ से उसकी आवाज़ , " बिटिया " , आजाती ...! संजय जी का तो मुहं ही बन जाता और मैं परेशान ...! मुझे सावित्री को समझाना ही पड़ा कि जब चौधरी साहब के खाना खाने  का समय हो तब ना आया करे। उसके बाद वह बाहर से गाड़ी खड़ी देख कर ही मुड़ जाती और बाद में आती।
     वह रसोई ही नहीं लेने आती बल्कि गीत गाने में ,किसी के घर रात को जागरण लगाना होता तो भी आगे रहती थी।उसे कभी देखो सर पर बड़ी वाली परात लिए घूमते देखा जा सकता था।
    उसके बेटे की शादी हो गयी थो मैंने हंस कर कहा , " दादी अब आप एक मोपेड ले लो बहू  को बोलो चला कर लाएगी और आप पीछे बैठ कर घर बताती रहना।"
उसने भी हंस कर जवाब दिया , " ठीक है बिटिया ...! फिर तो चौधरी साहब से ही दिलवा दो ...!"हम दोनों ही हंस पड़ी।
    मैं कोई भी चीज़ देती तो वह सोचती कि  उसकी बहू ना हथिया ले और छुपाने की कोशिश करती। मुझे यह देख कभी खीझ आती के यह कैसी सास है जो बहू के साथ ऐसा व्यवहार करती है। लेकिन अगले ही पल उसकी मजबूरी का सोच मन भर आता।
     मजबूर तो थी ही वह ...! उसकी नातिन की शादी थी तो किसी ने सलाह दी कि उसके पति को भी बुला लो वह भी आ जायेगा। यह बात मुझे बताते हए उसके चेहरे पर कितना दर्द था कितनी आहत थी वह आँखों में पानी नहीं था क्यूंकि वह सूख  चूका था।बोली , " बिटिया , अब वह क्या लेने आएगा ...सारी जिम्मेदारी मैंने उठाई और अब उसे नहीं बुलाऊंगी ...!" मैंने भी उसी का साथ दिया और कहा मत बुलाना उसे। कोई हक़ नहीं था उस आदमी को।
        मैं अक्सर उसकी सहायता कर देती थी ( तारीफ नहीं कर रही , मैं सिर्फ इसलिए करती थी कि यह ईश्वर की ही मर्जी है और उसने मुझे माध्यम बनाया है उसकी सहायता के लिए ) तो मुझे आस -पास से सुनना पड़ता के इसके पास बहुत है यह जो सामान हम देते हैं , बेच देती है आदि -आदि।
     इस बात के लिए मेरे पास एक ही तर्क था कि हम रूपये जो दक्षिणा के नाम पर देते है वह तो बहुत कम होती है , उसके परिवार में दो या तीन लोग ही हैं खाने वाले तो इतने सारे सामान का क्या करे वह ...! अगर बेच कर रूपये कमा लेती हैं तो बुरा क्या है वह भी उसी के काम आयेंगे ...!
ईश्वर से हम करोड़ रुपयों से कम नहीं मांगते और दान के नाम पर अगर किसी मजबूर की सहायता करनी हो तो सौ सवाल उठाएंगे।
    कई बार वह मुझसे ही व्रत-त्यौहार का पूछ लेती तो मैं हंस कर बोलती , " दादी आपकी दक्षिणा पर मेरा हक़ होगा , क्यूंकि आपका आधा काम तो मैं ही करती हूँ।" वह हंस कर हामी भर देती।
     आज जब उसके ना रहने का समाचार सुना तो मैं रो  नहीं पाई लेकिन मन बहुत अफ़सोस के साथ भर आया। एक मन सोचती हूँ कि  अच्छा हुआ ...! दुखों से मुक्ति मिल गई उसे और चलते -फिरते ही दुनिया से विदा हो गयी। पर हमारा मन मोह के बन्धनों से बंधा होता है तो जल्दी से मुक्त नहीं हो पाता है। सोचती हूँ कि इतनी जल्दी क्या थी उसे जाने की अभी तो मेरे बेटों की शादी होनी है कौन गीत गायेगा ...!
लेकिन सावित्री तो जा चुकी है। अब उसकी आत्मा की शांति की ही प्रार्थना कर सकती हूँ कि ईश्वर उसे अगले जन्म में कोई भी दुःख -तकलीफ ना दे।